सुरसरि जल कृत बारुनि जाना । कबहुँ न सन्त करहिँ तेहि पाना ॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें । ईस अनीसहि अन्तर तैसें ॥
surasari jala kṛta bāruni jānā | kabahum̐ na santa karahim̐ tehi pānā ||
surasari mileṃ so pāvana jaiseṃ | īsa anīsahi antara taiseṃ ||
5 श्लोक · 70 में से 361
नारद बोले, गंगाजल से बनी मदिरा को सन्त कभी नहीं पीते, पर वही जल गंगा में मिलकर पवित्र हो जाता है। ईश्वर और जीव में ऐसा ही अन्तर है। शम्भु स्वभाव से समर्थ भगवान हैं, इस विवाह में सब प्रकार कल्याण है। महेश कठिनाई से प्रसन्न होते हैं, पर क्लेश सहने पर वे आशुतोष तुरन्त प्रसन्न भी होते हैं। यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि होनी को भी मिटा सकते हैं। शिव की आराधना के बिना करोड़ों योग और जप साधने पर भी मनचाहा फल नहीं मिलता। ऐसा कहकर नारद ने हरि का स्मरण किया, गिरिजा को आशीर्वाद दिया और कहा कि हे गिरीश, संशय छोड़ो, अब सब कल्याण होगा।
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना । कबहुँ न सन्त करहिँ तेहि पाना ॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें । ईस अनीसहि अन्तर तैसें ॥
surasari jala kṛta bāruni jānā | kabahum̐ na santa karahim̐ tehi pānā ||
surasari mileṃ so pāvana jaiseṃ | īsa anīsahi antara taiseṃ ||
सम्भु सहज समरथ भगवाना । एहि बिबाहँ सब विधि कल्याना ॥
दुराराध्य पै अहहिँ महेसू । आसुतोष पुनि किये कलेसू ॥
sambhu sahaja samaratha bhagavānā | ehi bibāham̐ saba vidhi kalyānā ||
durārādhya pai ahahim̐ mahesū | āsutoṣa puni kiye kalesū ||
जौँ तप करइ कुमारि तुम्हारी । भाविउ मेटि सकहिँ त्रिपुरारी ॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं । एहि कहँ सिव, तजि दूसर नाहीँ ॥
jaum̐ tapa karai kumāri tumhārī | bhāviu meṭi sakahim̐ tripurārī ||
jadyapi bara aneka jaga māhīṃ | ehi kaham̐ siva, taji dūsara nāhīm̐ ||
बर-दायक प्रनतारति-भञ्जन । कृपासिन्धु सेवक-मन-रञ्जन ॥
इच्छित-फल बिनु सिव अवराधे । लहिअ न कोटि जोग जप साधें ॥
bara-dāyaka pranatārati-bhañjana | kṛpāsindhu sevaka-mana-rañjana ||
icchita-phala binu siva avarādhe | lahia na koṭi joga japa sādheṃ ||
अस कहि नारद सुमिरि हरि, गिरिजहि दीन्हि असीस ।
होइहि यह कल्यान अब, कल्यान संसय तजहु गिरीस ॥
asa kahi nārada sumiri hari, girijahi dīnhi asīsa |
hoihi yaha kalyāna aba, kalyāna saṃsaya tajahu girīsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0