एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी । अकथनीय दारुन दुख भारी ॥
बीतें सम्बत सहस-सतासी । तजी समाधि सम्भु अबिनासी ॥
ehi bidhi dukhita prajesakumārī | akathanīya dāruna dukha bhārī ||
bīteṃ sambata sahasa-satāsī | tajī samādhi sambhu abināsī ||
5 श्लोक · 60 में से 361
इस प्रकार दक्ष की पुत्री अकथनीय दुःख में रहीं। सत्तासी हज़ार वर्ष बीतने पर अविनाशी शम्भु ने समाधि छोड़ी और राम नाम का स्मरण करने लगे, तो सती ने जाना कि जगत के स्वामी जाग गए हैं। उन्होंने चरणों की वन्दना की, और शंकर ने उन्हें सामने आसन देकर हरि की रसमयी कथा कहनी आरम्भ की। उसी समय ब्रह्मा ने दक्ष को सब प्रकार योग्य देखकर प्रजापतियों का नायक बनाया। इतना बड़ा अधिकार पाकर दक्ष के हृदय में अत्यन्त अभिमान आ गया। तुलसीदास कहते हैं कि जगत में ऐसा कोई नहीं जन्मा जिसे प्रभुता पाकर मद न हो। दोहा कहता है कि दक्ष ने सब मुनियों को बुलाकर बड़ा यज्ञ आरम्भ किया और यज्ञ में भाग पाने वाले सब देवताओं को आदर से न्योता दिया।
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी । अकथनीय दारुन दुख भारी ॥
बीतें सम्बत सहस-सतासी । तजी समाधि सम्भु अबिनासी ॥
ehi bidhi dukhita prajesakumārī | akathanīya dāruna dukha bhārī ||
bīteṃ sambata sahasa-satāsī | tajī samādhi sambhu abināsī ||
राम नाम सिव सुमिरन लागे । जानेउ सतीं जगतपति जागे ॥
जाइ सम्भु-पद बन्दन कीन्हा । सनमुख सङ्कर आसन दीन्हा ॥
rāma nāma siva sumirana lāge | jāneu satīṃ jagatapati jāge ||
jāi sambhu-pada bandana kīnhā | sanamukha saṅkara āsana dīnhā ||
लगे कहन हरिकथा रसाला । दच्छ प्रजेस भये तेहि काला ॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक । दच्छहि कीन्ह प्रजापति-नायक ॥
lage kahana harikathā rasālā | daccha prajesa bhaye tehi kālā ||
dekhā bidhi bicāri saba lāyaka | dacchahi kīnha prajāpati-nāyaka ||
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा । अति अभिमान हृदयँ तब आवा ॥
नहिँ कोउ अस जनमा जग माहीँ । प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥
bar̤a adhikāra daccha jaba pāvā | ati abhimāna hṛdayam̐ taba āvā ||
nahim̐ kou asa janamā jaga māhīm̐ | prabhutā pāi jāhi mada nāhīṃ ||
दच्छ लिये मुनि बोलि सब, करन लगे बड़ जाग ।
नेवते सादर सकल सुर, जे पावत मख भाग ॥
daccha liye muni boli saba, karana lage bar̤a jāga |
nevate sādara sakala sura, je pāvata makha bhāga ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0