बालकाण्ड

अध्याय 6: गुण और दोष से भरा संसार

6 श्लोक · 6 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

गुण और दोष से भरा संसार

तुलसीदास बताते हैं कि उन्होंने सन्त और खल दोनों का वर्णन क्यों किया। एक के गुण और दूसरे के दोष, दोनों अथाह समुद्र हैं, और बिना पहचाने न अच्छे का संग्रह हो सकता है, न बुरे का त्याग। दोनों को विधाता ने रचा है और वेदों ने उन्हें अलग किया है। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि सृष्टि गुण और अवगुण से सनी है। फिर जोड़ियाँ गिनाई गई हैं: दुःख और सुख, पाप और पुण्य, दिन और रात, देव और दानव, अमृत और विष, माया और ब्रह्म, गंगा और कर्मनाशा, स्वर्ग और नरक। दोहे का निष्कर्ष है कि जड़ चेतन जगत गुण दोषमय है, और सन्त हंस की भाँति गुण रूपी दूध ले लेते हैं और विकार रूपी पानी छोड़ देते हैं।

6.1

खल-अघ-अगुन साधू-गुन-गाहा । उभय अपार उदधि अवगाहा ॥
तेहि तेँ कछु गुन दोष बखाने । सङ्ग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥

khala-agha-aguna sādhū-guna-gāhā | ubhaya apāra udadhi avagāhā ||
tehi tem̐ kachu guna doṣa bakhāne | saṅgraha tyāga na binu pahicāne ||

6.2

भलेउ पोच सब विधि उपजाये । गनि गुन दोष बेद बिलगाये ॥
कहहिँ बेद इतिहास पुराना । बिधि-प्रपञ्च गुन अवगुन साना ॥

bhaleu poca saba vidhi upajāye | gani guna doṣa beda bilagāye ||
kahahim̐ beda itihāsa purānā | bidhi-prapañca guna avaguna sānā ||

6.3

दुख-सुख पाप-पुन्य दिन-राती । साधु-असाधु सुजाति-कुजाती ॥
दानव-देव ऊँच अरु नीचू । अमिय सुजीवनु माहुर मीचू ॥

dukha-sukha pāpa-punya dina-rātī | sādhu-asādhu sujāti-kujātī ||
dānava-deva ūm̐ca aru nīcū | amiya sujīvanu māhura mīcū ||

6.4

माया ब्रह्म जीव-जगदीसा । लच्छि-अलच्छि रङ्क-अवनीसा ॥
कासी-मग सुरसरि-क्रमनासा । मरु-मारव महिदेव-गवासा ॥

māyā brahma jīva-jagadīsā | lacchi-alacchi raṅka-avanīsā ||
kāsī-maga surasari-kramanāsā | maru-mārava mahideva-gavāsā ||

6.5

सरग-नरक अनुराग-बिरागा । निगम-अगम गुन-दोष-विभागा ॥

saraga-naraka anurāga-birāgā | nigama-agama guna-doṣa-vibhāgā ||

दो॰ 6दोहा

जड़-चेतन गुन-दोष मय, बिस्व कीन्ह करतार ।
सन्त हंस गुन गहहिँ पय, परिहरि बारि बिकार ॥

jar̤a-cetana guna-doṣa maya, bisva kīnha karatāra |
santa haṃsa guna gahahim̐ paya, parihari bāri bikāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0