में अपनी दिसि कीन्ह निहोरा । तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा । होहिँ निरामिष कबहुँ कि कागा ॥
meṃ apanī disi kīnha nihorā | tinha nija ora na lāuba bhorā ||
bāyasa paliahiṃ ati anurāgā | hohim̐ nirāmiṣa kabahum̐ ki kāgā ||
6 श्लोक · 5 में से 361
तुलसीदास ने विनती कर दी, पर खल स्वभाव नहीं छोड़ेंगे; कौए को कितने ही प्रेम से पालो, वह मांस नहीं छोड़ता। इसलिए वे सन्त और असन्त दोनों के चरणों की वन्दना करते हैं, क्योंकि दोनों दुःख देते हैं। एक बिछुड़ते समय प्राण हर लेता है, दूसरा मिलते ही दारुण दुःख देता है। दोनों साथ जन्मते हैं, जैसे एक जल से कमल और जोंक, और एक समुद्र से अमृत और मदिरा। अपनी करनी से कोई सुयश पाता है, कोई अपयश। साधु अमृत, चन्द्रमा और गंगा जैसे हैं, असाधु विष, अग्नि और कलिमल की नदी जैसे। गुण और अवगुण सब जानते हैं, पर जिसे जो भाता है वही उसे अच्छा लगता है। दोहा कहता है कि अमृत अमरता के लिए सराहा जाता है और विष मृत्यु के लिए।
में अपनी दिसि कीन्ह निहोरा । तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा । होहिँ निरामिष कबहुँ कि कागा ॥
meṃ apanī disi kīnha nihorā | tinha nija ora na lāuba bhorā ||
bāyasa paliahiṃ ati anurāgā | hohim̐ nirāmiṣa kabahum̐ ki kāgā ||
बन्दउँ सन्त असज्जन चरना । दुख-प्रद-उभय बीच कछु बरना ॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन दुख देहीं ॥
bandaum̐ santa asajjana caranā | dukha-prada-ubhaya bīca kachu baranā ||
bichurata eka prāna hari lehīṃ | milata eka dukha dāruna dukha dehīṃ ||
उपजहिँ एक सङ्ग जग माहीं । जलज जोँक जिमि गुन बिलगाहीं ॥
सुधा सुरा सम साधू असाधू । जनक एक जग जलधि अगाधू ॥
upajahim̐ eka saṅga jaga māhīṃ | jalaja jom̐ka jimi guna bilagāhīṃ ||
sudhā surā sama sādhū asādhū | janaka eka jaga jaladhi agādhū ||
भल अनभल निज निज करतूती । लहत सुजस अपलोक बिभूती ॥
सुधा-सुधाकर-सुरसरि-साधू । गरल-अनल-कलिमल सरि ब्याधू ॥
bhala anabhala nija nija karatūtī | lahata sujasa apaloka bibhūtī ||
sudhā-sudhākara-surasari-sādhū | garala-anala-kalimala sari byādhū ||
गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ॥
guna avaguna jānata saba koī | jo jehi bhāva nīka tehi soī ||
भलो भलाइहि पै लहइ, लहइ निचाइहि नीचु ।
सुधा सराहिअ अमरताँ, गरल सराहिअ मीचु ॥
bhalo bhalāihi pai lahai, lahai nicāihi nīcu |
sudhā sarāhia amaratām̐, garala sarāhia mīcu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0