बालकाण्ड

अध्याय 4: खलों की व्यंग्य भरी वन्दना

7 श्लोक · 4 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

खलों की व्यंग्य भरी वन्दना

अब तुलसीदास सच्चे भाव से खलों को प्रणाम करते हैं, जो बिना कारण हितैषी से भी उलटे चलते हैं और पराई हानि में अपना लाभ देखते हैं। खल हरि और हर के यश रूपी चन्द्रमा के लिए राहु हैं, पराए हित रूपी घी में गिरी मक्खी हैं, क्रोध में यम के भैंसे और पाप रूपी धन में कुबेर हैं। वे केतु जैसे उदय होते हैं और कुम्भकर्ण जैसे सोते रहें तो ही भले। ओले की तरह वे खेती नष्ट करके स्वयं गल जाते हैं। पराए दोष कहने को वे सहस्रमुख शेष हैं, देखने को सहस्रनयन इन्द्र, और पराए पाप सुनने को दस हजार कानों वाले पृथु। दोहा कहता है कि वे किसी का भला सुनकर जलते हैं, इसलिए कवि हाथ जोड़ता है।

4.1

बहुरि बन्दि खल गन सतिभाये । जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ ॥
पर-हित-हानि लाभ जिन्ह केरें । उजरें हरष विषाद बसेरें ॥

bahuri bandi khala gana satibhāye | je binu kāja dāhinehu bāem̐ ||
para-hita-hāni lābha jinha kereṃ | ujareṃ haraṣa viṣāda basereṃ ||

4.2

हरि-हर-जस राकेस राहु से । पर अकाज भट सहसबाहु से ॥
जे पर-दोष लखहिँ सहसाखी । पर हित घृत जिनके मन माखी ॥

hari-hara-jasa rākesa rāhu se | para akāja bhaṭa sahasabāhu se ||
je para-doṣa lakhahim̐ sahasākhī | para hita ghṛta jinake mana mākhī ||

4.3

तेज-कृसानु रोष महिषेसा । अघ-अवगुन-धन धनी धनेसा ॥
उदय केतु सम हित सबही के । कुम्भकरन सम सोवत नीके ॥

teja-kṛsānu roṣa mahiṣesā | agha-avaguna-dhana dhanī dhanesā ||
udaya ketu sama hita sabahī ke | kumbhakarana sama sovata nīke ||

4.4

पर अकाज लगि तनु परिहरहीं । जिमि हिम-उपल कृषी दलि गरहीं ॥
बन्दउँ खल जस सेष सरोषा । सहस-बदन बरनइ पर-दोषा ॥

para akāja lagi tanu pariharahīṃ | jimi hima-upala kṛṣī dali garahīṃ ||
bandaum̐ khala jasa seṣa saroṣā | sahasa-badana baranai para-doṣā ||

4.5

पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना । पर अघ सुनइ सहस-दस-काना ॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही । सन्तत सुरा-नीक हित जेही ॥

puni pranavaum̐ pṛthurāja samānā | para agha sunai sahasa-dasa-kānā ||
bahuri sakra sama binavaum̐ tehī | santata surā-nīka hita jehī ||

4.6

बचन बज्र जेहि सदा पियारा । सहस-नयन पर दोष निहारा ॥

bacana bajra jehi sadā piyārā | sahasa-nayana para doṣa nihārā ||

दो॰ 4दोहा

उदासीन-अरि-मीत-हित, सुनत जरहिं खल रीति ।
जानि पानि जुग जोरि जन, विनती करइ सप्रीति ॥

udāsīna-ari-mīta-hita, sunata jarahiṃ khala rīti |
jāni pāni juga jori jana, vinatī karai saprīti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0