बालकाण्ड

अध्याय 47: याज्ञवल्क्य मुस्कुराकर कथा आरम्भ करते हैं

5 श्लोक · 47 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

याज्ञवल्क्य मुस्कुराकर कथा आरम्भ करते हैं

भरद्वाज विस्तार से कथा कहने की विनती करते हैं, जिससे मोह मिटे। याज्ञवल्क्य मुस्कुराकर बोले कि रघुपति की प्रभुता तुम जानते हो, तुम मन, कर्म और वचन से राम के भक्त हो, और मैं तुम्हारी चतुराई समझ गया। राम के गूढ़ गुण सुनने के लिए तुमने ऐसा प्रश्न किया है मानो कुछ न जानते हो। मन लगाकर सुनो। महामोह महिषासुर है और रामकथा उसे मारने वाली भयंकर कालिका। रामकथा चन्द्रमा की किरण है, जिसे सन्त चकोर बनकर पीते हैं। ऐसा ही संशय भवानी ने किया था और महादेव ने समझाया था। दोहा कहता है कि अब मैं उमा और शम्भु का वह संवाद कहूँगा, जिस समय और जिस कारण हुआ, और तुम्हारा विषाद मिट जाएगा।

47.1

जैसे मिटइ मोह भ्रम भारी । कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी ॥
जागबलिक बोले मुसुकाई । तुम्हहिँ विदित रघुपति प्रभुताई ॥

jaise miṭai moha bhrama bhārī | kahahu so kathā nātha bistārī ||
jāgabalika bole musukāī | tumhahim̐ vidita raghupati prabhutāī ||

47.2

रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी । चतुराई तुम्हारि मैं जानी ॥
चाहहु सुनइ राम-गुन-गूढ़ा । कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढा ॥

rāmabhagata tumha mana krama bānī | caturāī tumhāri maiṃ jānī ||
cāhahu sunai rāma-guna-gūr̤hā | kīnhihu prasna manahum̐ ati mūḍhā ||

47.3

तात सुनहु सादर मन लाई । कहउँ राम कै कथा सुहाई ॥
महामोह महिषेस बिसाला । रामकथा कालिका कराला ॥

tāta sunahu sādara mana lāī | kahaum̐ rāma kai kathā suhāī ||
mahāmoha mahiṣesa bisālā | rāmakathā kālikā karālā ||

47.4

रामकथा ससि-किरन समाना । सन्त चकोर करहिं जेहि पाना ॥
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी । महादेव तब कहा बखानी ॥

rāmakathā sasi-kirana samānā | santa cakora karahiṃ jehi pānā ||
aisei saṃsaya kīnha bhavānī | mahādeva taba kahā bakhānī ||

दो॰ 47दोहा

कहउँ सो मति अनुहारि अब, उमा-सम्भु सम्बाद ।
भयउ समय जेहि हेतु जेहि, सुनु मुनि मिटिहि बिषाद ॥

kahaum̐ so mati anuhāri aba, umā-sambhu sambāda |
bhayau samaya jehi hetu jehi, sunu muni miṭihi biṣāda ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0