अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू । हरहु नाथ करि जन पर छोहू ॥
राम नाम कर अमित प्रभावा । सन्त पुरान उपनिषद गावा ॥
asa bicāri pragaṭaum̐ nija mohū | harahu nātha kari jana para chohū ||
rāma nāma kara amita prabhāvā | santa purāna upaniṣada gāvā ||
5 श्लोक · 46 में से 361
भरद्वाज अपना मोह प्रकट करके मुनि से उसे हरने की विनती करते हैं। सन्त, पुराण और उपनिषद राम नाम के अपार प्रभाव का गान करते हैं। ज्ञान के भण्डार अविनाशी शम्भु उसे निरन्तर जपते हैं। काशी में मरने वाले सब जीव परमपद पाते हैं, और यह भी राम की ही महिमा है, क्योंकि शिव दया करके वहाँ उन्हें नाम का उपदेश देते हैं। इसलिए वे पूछते हैं कि ये राम कौन हैं? एक राम अवधपति के पुत्र हैं, जिनका चरित संसार जानता है। उन्होंने पत्नी के विरह में अपार दुःख पाया और क्रोध करके युद्ध में रावण को मारा। दोहे में प्रश्न है: जिन्हें त्रिपुरारि जपते हैं, क्या वे प्रभु यही राम हैं या कोई और? आप सत्य के धाम और सर्वज्ञ हैं, विचार करके बताइए।
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू । हरहु नाथ करि जन पर छोहू ॥
राम नाम कर अमित प्रभावा । सन्त पुरान उपनिषद गावा ॥
asa bicāri pragaṭaum̐ nija mohū | harahu nātha kari jana para chohū ||
rāma nāma kara amita prabhāvā | santa purāna upaniṣada gāvā ||
सन्तत जपत सम्भु अबिनासी । सिव भगवान ज्ञान-गुन-रासी ॥
आकर चारि जीव जग अहहीँ । कासीं मरत परम-पद लहहीँ ॥
santata japata sambhu abināsī | siva bhagavāna jñāna-guna-rāsī ||
ākara cāri jīva jaga ahahīm̐ | kāsīṃ marata parama-pada lahahīm̐ ||
सोपि राम-महिमा मुनिराया । सिव उपदेस करत करि दाया ॥
राम कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिय बुझाइ कृपानिधि मोही ॥
sopi rāma-mahimā munirāyā | siva upadesa karata kari dāyā ||
rāma kavana prabhu pūchaum̐ tohī | kahiya bujhāi kṛpānidhi mohī ||
एक राम अवधेस-कुमारा । तिन्ह कर चरित बिदित संसारा ॥
नारि बिरहँ दुख लहेउ अपारा । भयउ रोष रन रावन मारा ॥
eka rāma avadhesa-kumārā | tinha kara carita bidita saṃsārā ||
nāri biraham̐ dukha laheu apārā | bhayau roṣa rana rāvana mārā ||
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ, जाहि जपत त्रिपुरारि ।
सत्यधाम सर्वज्ञ तुम्ह, कहहु बिबेक बिचारि ॥
prabhu soi rāma ki apara kou, jāhi japata tripurāri |
satyadhāma sarvajña tumha, kahahu bibeka bicāri ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0