बालकाण्ड

अध्याय 45: भरद्वाज ने याज्ञवल्क्य से संशय कहा

5 श्लोक · 45 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

भरद्वाज ने याज्ञवल्क्य से संशय कहा

इस प्रकार वे पूरे माघ नहाकर अपने आश्रमों को लौटते हैं, हर वर्ष। एक बार मास भर का स्नान पूरा होने पर जब सब मुनि चले गए, तब भरद्वाज ने परम विवेकी याज्ञवल्क्य के चरण पकड़कर उन्हें रोक लिया। उनके चरण धोए, पवित्र आसन पर बैठाया, पूजा और प्रशंसा की, और कोमल वाणी में बोले। नाथ, मेरे मन में एक बड़ा संशय है, और वेदों का सारा तत्त्व आपके हाथ में है। कहने में भय और लाज लगती है, पर न कहूँ तो बड़ी हानि होगी। दोहे में कारण है कि सन्त, वेद, पुराण और मुनि कहते हैं कि गुरु से छिपाव करने पर हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता।

45.1

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीँ । पुनि सब निज निज आस्रम जाहीँ ॥
प्रति सम्बत अति होइ अनन्दा । मकर मज्जि गवनहिँ मुनिबृन्दा ॥

ehi prakāra bhari māgha nahāhīm̐ | puni saba nija nija āsrama jāhīm̐ ||
prati sambata ati hoi anandā | makara majji gavanahim̐ munibṛndā ||

45.2

एक बार भरि मकर नहाये । सब मुनीस आस्रमन्ह सिधाये ॥
जगबालिक मुनि परम बिबेकी । भरद्वाज राखे पद टेकी ॥

eka bāra bhari makara nahāye | saba munīsa āsramanha sidhāye ||
jagabālika muni parama bibekī | bharadvāja rākhe pada ṭekī ||

45.3

सादर चरन-सरोज पखारे । अति पुनीत आसन बैठारे ॥
करि पूजा मुनि-सुजस बखानी । बोले अति पुनीत मृदु-बानी ॥

sādara carana-saroja pakhāre | ati punīta āsana baiṭhāre ||
kari pūjā muni-sujasa bakhānī | bole ati punīta mṛdu-bānī ||

45.4

नाथ एक संसय बड़ मोरें । करगत बेदतत्व सब तोरें ॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा । जौँ न कहउँ बड़ होइ अकाजा ॥

nātha eka saṃsaya bar̤a moreṃ | karagata bedatatva saba toreṃ ||
kahata so mohi lāgata bhaya lājā | jaum̐ na kahaum̐ bar̤a hoi akājā ||

दो॰ 45दोहा

सन्त कहहिँ अस नीति प्रभु, स्रुति-पुरान-मुनि गाव ।
होइ न बिमल बिबेक उर, गुरु सन किये दुराव ॥

santa kahahim̐ asa nīti prabhu, sruti-purāna-muni gāva |
hoi na bimala bibeka ura, guru sana kiye durāva ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0