बालकाण्ड

अध्याय 41: स्वयंवर, विवाह और कैकेयी की काई

5 श्लोक · 41 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

स्वयंवर, विवाह और कैकेयी की काई

सीता के स्वयंवर की कथा नदी पर छाई शोभा है। चतुर प्रश्न नावें हैं और विवेकपूर्ण उत्तर कुशल केवट। श्रोताओं की आपसी चर्चा किनारे के यात्रियों का समाज है। परशुराम का क्रोध भयानक धारा है, और राम के मधुर वचन बँधा हुआ घाट। भाइयों सहित राम का विवाह नदी की बाढ़ है, और इसे पुलकित होकर कहने सुनने वाले नहाने वाले पुण्यात्मा। राम के तिलक की तैयारी पर्व पर जुटी भीड़ है। कैकेयी की कुबुद्धि जल पर पड़ी काई है, जिससे भारी विपत्ति आई। दोहा कहता है कि भरत का चरित सब उत्पात शान्त करने वाला जप और यज्ञ है, और कलि के पाप तथा दुष्टों का वर्णन जल का मैल, बगुले और कौए।

41.1

सीय-स्वयम्बर-कथा सुहाई । सरित सुहावनि सो छबि छाई ॥
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका । केवट कुसल उतर सबिबेका ॥

sīya-svayambara-kathā suhāī | sarita suhāvani so chabi chāī ||
nadī nāva paṭu prasna anekā | kevaṭa kusala utara sabibekā ||

41.2

सुनि अनुकथन परसपर होई । पथिक-समाज सोह सरि सोई ॥
घोर धार भृगुनाथ रिसानी । घाट सुबद्ध राम बर बानी ॥

suni anukathana parasapara hoī | pathika-samāja soha sari soī ||
ghora dhāra bhṛgunātha risānī | ghāṭa subaddha rāma bara bānī ||

41.3

सानुज राम-बिबाह-उछाहू । सो सुभ उमग सुखद सब काहू ॥
कहत सुनत हरषहिँ पुलकाहीं । ते सुकृती मन मुदित नहाहीं ॥

sānuja rāma-bibāha-uchāhū | so subha umaga sukhada saba kāhū ||
kahata sunata haraṣahim̐ pulakāhīṃ | te sukṛtī mana mudita nahāhīṃ ||

41.4

राम तिलक हित मङ्गल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ॥
काई कुमति केकई केरी । परी जासु फल बिपति घनेरी ॥

rāma tilaka hita maṅgala sājā | paraba joga janu jure samājā ||
kāī kumati kekaī kerī | parī jāsu phala bipati ghanerī ||

दो॰ 41दोहा

समन अमित उतपात सब, भरत चरित जप जाग ।
कलि अघ खल अवगुन कथन, ते जल मल बक काग ॥

samana amita utapāta saba, bharata carita japa jāga |
kali agha khala avaguna kathana, te jala mala baka kāga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0