बालकाण्ड

अध्याय 343: विश्वामित्र के चरणों में जनक, अवध की ओर

5 श्लोक · 343 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

विश्वामित्र के चरणों में जनक, अवध की ओर

बार बार विनय और बड़ाई करके श्रीराम भाइयों सहित आगे बढ़ते हैं। जनक जाकर विश्वामित्र के चरण पकड़ लेते हैं और चरणरज सिर और आँखों से लगाते हैं। वे कहते हैं, हे मुनीश, आपके श्रेष्ठ दर्शन से कुछ भी अगम नहीं, यह मेरे मन का विश्वास है। जिस सुख और सुयश को लोकपाल चाहते हैं पर मनोरथ करते हुए भी सकुचाते हैं, वह हे स्वामी, मुझे सहज मिल गया। सब सिद्धियाँ आपके दर्शन के पीछे चलती हैं। आशीर्वाद पाकर राजा लौट जाते हैं। नगाड़े बजाती बारात चल पड़ती है, छोटे बड़े सब प्रसन्न हैं। बीच बीच में अच्छे स्थानों पर ठहरती और मार्ग के लोगों को सुख देती बारात पवित्र दिन अवध के समीप आ पहुँचती है।

343.1

बार बार करि विनय बड़ाई । रघुपति चले सङ्ग सब भाई ॥
जनक गहे कौसिक पद जाई । चरन-रेनु सिर नयनन्हि लाई ॥

bāra bāra kari vinaya bar̤āī | raghupati cale saṅga saba bhāī ||
janaka gahe kausika pada jāī | carana-renu sira nayananhi lāī ||

343.2

सुनु मुनीस बर-दरसन तोरें । अगम न कछु प्रतीति मन मोरें ॥
जो सुख सुजसु लोकपति चहहीं । करत मनोरथ सकुचत अहहीं ॥

sunu munīsa bara-darasana toreṃ | agama na kachu pratīti mana moreṃ ||
jo sukha sujasu lokapati cahahīṃ | karata manoratha sakucata ahahīṃ ||

343.3

सो सुख सुजस सुलभ मोहि स्वामी । सर सिधि तव दरसन अनुगामी ॥
कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई । फिरे महीसु आसिषा पाई ॥

so sukha sujasa sulabha mohi svāmī | sara sidhi tava darasana anugāmī ||
kīnhi binaya puni puni siru nāī | phire mahīsu āsiṣā pāī ||

343.4

चली बरात निसान बजाई । मुदित छोट बड़ सब समुदाई ॥
रामहि निरखि ग्राम-नर-नारी । पाइ नयन-फल होहिं सुखारी ॥

calī barāta nisāna bajāī | mudita choṭa bar̤a saba samudāī ||
rāmahi nirakhi grāma-nara-nārī | pāi nayana-phala hohiṃ sukhārī ||

दो॰ 343दोहा

बीच बीच बर बास करि, मग लोगन्ह सुख देत ।
अवध समीप पुनीत दिन, पहुँची आइ जनेत ॥

bīca bīca bara bāsa kari, maga loganha sukha deta |
avadha samīpa punīta dina, pahum̐cī āi janeta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0