सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई । निज जन जानि लीन्ह अपनाई ॥
होहिँ सहस-दस सारद सेखा । करहिँ कलप कोटिक भरि लेखा ॥
sabahi bhām̐ti mohi dīnhi bar̤āī | nija jana jāni līnha apanāī ||
hohim̐ sahasa-dasa sārada sekhā | karahim̐ kalapa koṭika bhari lekhā ||
5 श्लोक · 342 में से 361
जनक आगे कहते हैं कि आपने मुझे सब प्रकार बड़ाई दी और अपना जन जानकर अपना लिया। दस हजार सरस्वती और शेष करोड़ों कल्पों तक लिखें, तब भी हे रघुनाथ, मेरे भाग्य और आपके गुणों की कथा पूरी न होगी। मैं जो कुछ कहता हूँ, एक ही बल पर कहता हूँ कि आप थोड़े से स्नेह पर भी रीझ जाते हैं। मैं हाथ जोड़कर बार बार यही माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरण न छोड़े। प्रेम से पुष्ट ये वचन सुनकर पूर्णकाम श्रीराम संतुष्ट होते हैं। वे ससुर को पिता, विश्वामित्र और वसिष्ठ के समान जानकर उनका सम्मान करते हैं। फिर जनक भरत से विनती करते हैं, प्रेम से मिलकर आशीर्वाद देते हैं, और लक्ष्मण व शत्रुघ्न से भी मिलकर उन्हें आशीष देते हैं।
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई । निज जन जानि लीन्ह अपनाई ॥
होहिँ सहस-दस सारद सेखा । करहिँ कलप कोटिक भरि लेखा ॥
sabahi bhām̐ti mohi dīnhi bar̤āī | nija jana jāni līnha apanāī ||
hohim̐ sahasa-dasa sārada sekhā | karahim̐ kalapa koṭika bhari lekhā ||
मोर भाग्य राउर गुन-गाथा । कहि न सिराहिँ सुनहु रघुनाथा ॥
मैं कछु कहउँ एक बल मोरें । तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें ॥
mora bhāgya rāura guna-gāthā | kahi na sirāhim̐ sunahu raghunāthā ||
maiṃ kachu kahaum̐ eka bala moreṃ | tumha rījhahu saneha suṭhi thoreṃ ||
बार बार माँगउँ कर जोरें । मन परिहरै चरन जनि भोरें ॥
सुनि घर बचन प्रेम जनु पोषे । पूरनकाम राम परितोषे ॥
bāra bāra mām̐gaum̐ kara joreṃ | mana pariharai carana jani bhoreṃ ||
suni ghara bacana prema janu poṣe | pūranakāma rāma paritoṣe ||
करि घर बिनय ससुर सनमाने । पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने ॥
बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही । मिलि सप्रेम पुनि आसिष दीन्ही ॥
kari ghara binaya sasura sanamāne | pitu kausika basiṣṭha sama jāne ||
binatī bahuri bharata sana kīnhī | mili saprema puni āsiṣa dīnhī ||
मिले लखन रिपुसूदनहि, दीन्ह असीस महीस ।
भये परसपर प्रेम-बस, फिरि फिरि नावहिँ सीस ॥
mile lakhana ripusūdanahi, dīnha asīsa mahīsa |
bhaye parasapara prema-basa, phiri phiri nāvahim̐ sīsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0