चारिउ भाइ सुभायँ सुहाये । नगर नारि नर देखन धाए ॥
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू । कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू ॥
cāriu bhāi subhāyam̐ suhāye | nagara nāri nara dekhana dhāe ||
kou kaha calana cahata hahiṃ ājū | kīnha bideha bidā kara sājū ||
5 श्लोक · 335 में से 361
चारों भाइयों को जाते देख नगर के नर नारी उन्हें देखने दौड़ पड़ते हैं। कोई कहता है कि ये आज ही जाना चाहते हैं, विदेह ने विदा की तैयारी कर दी है। इन चारों प्यारे पाहुनों का रूप आँख भरकर देख लो, कौन जाने किस पुण्य से विधाता ने इन्हें हमारी आँखों का अतिथि बनाया। इनका दर्शन हमारे लिए वैसा ही है जैसे मरने वाले को अमृत, जन्म के भूखे को कल्पवृक्ष, या नरक में पड़े जीव को हरि के चरण। श्रीराम की शोभा को हृदय में ऐसे रखो जैसे सर्प अपनी मणि रखता है। इस प्रकार सबको नेत्रों का फल देते हुए कुमार राजमहल पहुँचते हैं। रूप के सागर भाइयों को देखकर रनिवास हर्ष से उठ खड़ा होता है और सासें आरती उतारकर न्योछावर करती हैं।
चारिउ भाइ सुभायँ सुहाये । नगर नारि नर देखन धाए ॥
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू । कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू ॥
cāriu bhāi subhāyam̐ suhāye | nagara nāri nara dekhana dhāe ||
kou kaha calana cahata hahiṃ ājū | kīnha bideha bidā kara sājū ||
लेहु नयन भरि रूप निहारी । प्रिय पाहुने भूप-सुत-चारी ॥
को जानइ केहि सुकृत सयानी । नयन अतिथि कीन्हे विधि आनी ॥
lehu nayana bhari rūpa nihārī | priya pāhune bhūpa-suta-cārī ||
ko jānai kehi sukṛta sayānī | nayana atithi kīnhe vidhi ānī ||
मरनसील जिमि पाव पिऊषा । सुरतरु लहइ जनम के भूखा ॥
पाव नारकी हरि-पद जैसें । इन्ह कर दरसन हम कहँ तैसे ॥
maranasīla jimi pāva piūṣā | surataru lahai janama ke bhūkhā ||
pāva nārakī hari-pada jaiseṃ | inha kara darasana hama kaham̐ taise ||
निरखि राम सोभा उर धरहू । निज-मन-फनि-मूरति-मनि करहू ॥
एहि बिधि सबहि नयन फल देता । गये कुअँर सब राज-निकेता ॥
nirakhi rāma sobhā ura dharahū | nija-mana-phani-mūrati-mani karahū ||
ehi bidhi sabahi nayana phala detā | gaye kuam̐ra saba rāja-niketā ||
रूप-सिन्धु सब बन्धु लखि, हरषि उठा रनिवासु ।
करहिँ निछावरि आरती, महा-मुदित मन सासु ॥
rūpa-sindhu saba bandhu lakhi, haraṣi uṭhā ranivāsu |
karahim̐ nichāvari āratī, mahā-mudita mana sāsu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0