बालकाण्ड

अध्याय 322: सीता मंडप में लाई जाती हैं

6 श्लोक · 322 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सीता मंडप में लाई जाती हैं

उचित समय देखकर वसिष्ठ शतानंद को बुलाते हैं और कहते हैं कि अब शीघ्र राजकुमारी को ले आइए। पुरोहित की बात सुनकर रानी प्रसन्न होकर सखियों को साथ लेती हैं, ब्राह्मणों की स्त्रियों और कुल की वृद्धाओं को बुलाती हैं, और वे कुलरीति के अनुसार मंगलगीत गाती हैं। स्त्री वेष धरी देवियाँ भी उनमें हैं। रनिवास की स्त्रियाँ उन्हें बिना पहचाने प्राणों से भी प्यारा मानती हैं, और रानी उन्हें उमा, रमा और सरस्वती के समान जानकर बार बार सम्मान देती हैं। सीता को सजाकर वे मतवाले हाथी की चाल से मंडप की ओर ले चलती हैं। उनका मधुर गान सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं, नूपुर और कंगन ताल पर बजते हैं। स्त्रियों के बीच सहज सुहावनी सीता ऐसी शोभती हैं मानो सुंदरियों के बीच स्वयं शोभा विराजती हो।

322.1

समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाये । सादर सतानन्द सुनि आये ॥
बेगि कुँअरि अब आनहु जाई । चले मुदित मन आयसु पाई ॥

samau biloki basiṣṭha bolāye | sādara satānanda suni āye ||
begi kum̐ari aba ānahu jāī | cale mudita mana āyasu pāī ||

322.2

रानी सुनि उपरोहित बानी । प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी ॥
बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं । करि कुल रीति सुमङ्गल गाईं ॥

rānī suni uparohita bānī | pramudita sakhinha sameta sayānī ||
bipra badhū kulabṛddha bolāīṃ | kari kula rīti sumaṅgala gāīṃ ||

322.3

नारि बेष जे सुर बर बामा । सकल सुभायँ सुन्दरी स्यामा ॥
तिन्हहिँ देखि सुख पावहिँ नारीं । बिनु पहिचानि प्रानहु तैं प्यारीं ॥

nāri beṣa je sura bara bāmā | sakala subhāyam̐ sundarī syāmā ||
tinhahim̐ dekhi sukha pāvahim̐ nārīṃ | binu pahicāni prānahu taiṃ pyārīṃ ||

322.4

बार बार सनमानहिँ रानी । उमा-रमा-सारद-सम जानी ॥
सीय सँवारि समाज बनाई । मुदित मंडपहिं चलीँ लवाई ॥

bāra bāra sanamānahim̐ rānī | umā-ramā-sārada-sama jānī ||
sīya sam̐vāri samāja banāī | mudita maṃḍapahiṃ calīm̐ lavāī ||

322.छं॰ 1छन्द

चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर, सजि सुमङ्गल भामिनीं ।
नवसप्त साजें सुन्दरी सब, मत्त-कुञ्जर-गामिनीं ॥
कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं, काम-कोकिल लाजहीं ।
मंजीर नूपुर कलित कङ्कन, ताल-गति बर बाजहीं ॥

cali lyāi sītahi sakhīṃ sādara, saji sumaṅgala bhāminīṃ |
navasapta sājeṃ sundarī saba, matta-kuñjara-gāminīṃ ||
kala gāna suni muni dhyāna tyāgahiṃ, kāma-kokila lājahīṃ |
maṃjīra nūpura kalita kaṅkana, tāla-gati bara bājahīṃ ||

दो॰ 322दोहा

सोहति बनिता वृन्द महँ, सहज सुहावनि सीय ।
छबि ललना गन मध्य जनु, सुखमा तिय कमनीय ॥

sohati banitā vṛnda maham̐, sahaja suhāvani sīya |
chabi lalanā gana madhya janu, sukhamā tiya kamanīya ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0