बालकाण्ड

अध्याय 321: जनक द्वारा दशरथ और छिपे देवताओं का सम्मान

6 श्लोक · 321 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

जनक द्वारा दशरथ और छिपे देवताओं का सम्मान

फिर जनक कोसलपति दशरथ का ईश्वर के समान भाव से पूजन करते हैं, हाथ जोड़कर विनती करते हैं और अपने भाग्य की बड़ाई करते हैं। वे सब बारातियों को समधी के समान आदर देते हैं, सबको उचित आसन, दान, मान और मीठे वचन देते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य, जो श्रीराम का प्रभाव जानते हैं, ब्राह्मणों का कपट वेष धरकर कौतुक देख रहे हैं। जनक बिना पहचाने उन्हें देवताओं के समान मानकर पूजते हैं और सुंदर आसन देते हैं। आनंदकंद दूल्हे को देखकर सबको अपनी सुध भूल गई है, कौन किसे पहचाने। केवल सुजान श्रीराम देवताओं को पहचान लेते हैं और मन ही मन उन्हें आसन देते हैं। प्रभु का शील देखकर देवता प्रसन्न होते हैं। सब चकोर की भाँति श्रीराम के मुखचंद्र की छवि पीते हैं।

321.1

बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा । जानि ईस सम भाव न दूजा ॥
कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई । कहि निज-भाग्य विभव बहुताई ॥

bahuri kīnha kosalapati pūjā | jāni īsa sama bhāva na dūjā ||
kīnha jori kara binaya bar̤āī | kahi nija-bhāgya vibhava bahutāī ||

321.2

पूजे भूपति सकल बराती । समधी सम सादर सब भाँती ॥
आसन उचित दिये सब काहू । कहउँ कहा मुख एक उछाहू ॥

pūje bhūpati sakala barātī | samadhī sama sādara saba bhām̐tī ||
āsana ucita diye saba kāhū | kahaum̐ kahā mukha eka uchāhū ||

321.3

सकल बरात जनक सनमानी । दान मान बिनती बर बानी ॥
विधि-हरि-हर-दिसिपति-दिनराऊ । जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ ॥

sakala barāta janaka sanamānī | dāna māna binatī bara bānī ||
vidhi-hari-hara-disipati-dinarāū | je jānahiṃ raghubīra prabhāū ||

321.4

कपट विप्र-बर बेष बनाये । कौतुक देखहिँ अति सचु पाये ॥
पूजे जनक देव सम जानें । दिये सुआसन बिनु, पहिचानें ॥

kapaṭa vipra-bara beṣa banāye | kautuka dekhahim̐ ati sacu pāye ||
pūje janaka deva sama jāneṃ | diye suāsana binu, pahicāneṃ ||

321.छं॰ 1छन्द

पहिचान को केहि जान सबहिँ, अपान सुधि भोरी भई ।
आनन्द-कन्द बिलोकि दूलह, उभय-दिसि आनँद मई ॥
सुर लखे राम सुजान पूजे, मानसिक आसन दये ।
अवलोकि सील सुभाउ प्रभु को, बिबुध मन प्रमुदित भये ॥

pahicāna ko kehi jāna sabahim̐, apāna sudhi bhorī bhaī |
ānanda-kanda biloki dūlaha, ubhaya-disi ānam̐da maī ||
sura lakhe rāma sujāna pūje, mānasika āsana daye |
avaloki sīla subhāu prabhu ko, bibudha mana pramudita bhaye ||

दो॰ 321दोहा

रामचन्द्र मुख चन्द्र-छबि, लोचन चारु चकोर ।
करत पान सादर सकल, प्रेम प्रमोद न थोर ॥

rāmacandra mukha candra-chabi, locana cāru cakora |
karata pāna sādara sakala, prema pramoda na thora ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0