बालकाण्ड

अध्याय 318: देवियाँ जनकपुर की स्त्रियों में आ मिलीं

6 श्लोक · 318 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

देवियाँ जनकपुर की स्त्रियों में आ मिलीं

परछन के लिए निकली स्त्रियाँ चंद्रमुखी और मृगनयनी हैं। वे रंग रंग के वस्त्र और सब आभूषण पहने हैं और इतना मधुर गाती हैं कि कोयल लजा जाए। चलते समय कंगन, करधनी और नूपुर बजते हैं। तभी शची, सरस्वती, लक्ष्मी, भवानी और दूसरी देवियाँ सुंदर स्त्रियों का कपट वेष धरकर रनिवास में आ मिलती हैं और मंगलगीत गाने लगती हैं। आनंद में डूबे किसी को उनकी पहचान नहीं होती। वे स्वयं ब्रह्म रूप दूल्हे का परछन करने चलती हैं, और उन्हें देखकर सबके कमल नेत्रों में जल भर आता है, शरीर पुलकित हो जाता है। दोहा कहता है कि दूल्हे के वेष में श्रीराम को देखकर सीता की माता को जो सुख मिला, उसे सौ कल्पों में हजारों सरस्वती और शेष भी नहीं कह सकते।

318.1

बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि । सब निज तन छबि रति मदु मोचनि ॥
पहिरें बरन बरन बर चीरा । सकल विभूषन सजें सरीरा ॥

bidhubadanīṃ saba saba mṛgalocani | saba nija tana chabi rati madu mocani ||
pahireṃ barana barana bara cīrā | sakala vibhūṣana sajeṃ sarīrā ||

318.2

सकल सुमङ्गल अङ्ग बनाये । करहिँ गान कलकंठि लजाये ॥
कङ्कन किङ्किनि नूपुर बाजहिँ । चालि बिलोकि काम गज लाजहिँ ॥

sakala sumaṅgala aṅga banāye | karahim̐ gāna kalakaṃṭhi lajāye ||
kaṅkana kiṅkini nūpura bājahim̐ | cāli biloki kāma gaja lājahim̐ ||

318.3

बाजहिँ बाजन विविध प्रकारा । नभ अरु नगर सुमङ्गल चारा ॥
सची सारदा रमा भवानी । जे सुरतिय सुचि सहज सयानी ॥

bājahim̐ bājana vividha prakārā | nabha aru nagara sumaṅgala cārā ||
sacī sāradā ramā bhavānī | je suratiya suci sahaja sayānī ||

318.4

कपट नारि बर बेष बनाई । मिलीँ सकल रनिवासहिं जाई ॥
करहिँ गान कल मङ्गल बानीं । हरष बिबस सम काहु न जानी ॥

kapaṭa nāri bara beṣa banāī | milīm̐ sakala ranivāsahiṃ jāī ||
karahim̐ gāna kala maṅgala bānīṃ | haraṣa bibasa sama kāhu na jānī ||

318.छं॰ 1छन्द

को जान केहि आनन्द-बस सब, ब्रह्म-घर परिछन चली ।
कल गान मधुर-निसान बरषहिँ, सुमन सुर सोभा भली ॥
आनन्द-कन्द बिलोकि दूलह, सकल हियँ हरषित भई ।
अम्भोज-अम्बक अम्बु उमगि सुअङ्ग पुलकावलि छई ॥

ko jāna kehi ānanda-basa saba, brahma-ghara parichana calī |
kala gāna madhura-nisāna baraṣahim̐, sumana sura sobhā bhalī ||
ānanda-kanda biloki dūlaha, sakala hiyam̐ haraṣita bhaī |
ambhoja-ambaka ambu umagi suaṅga pulakāvali chaī ||

दो॰ 318दोहा

जो सुख भा सिय मातु मन, देखि राम बर बेष ।
सो न सकहिं कहि कलप-सत, सहस-सारदा-सेष ॥

jo sukha bhā siya mātu mana, dekhi rāma bara beṣa |
so na sakahiṃ kahi kalapa-sata, sahasa-sāradā-seṣa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0