बिहँसि लखन बोले मृदुबानी । अहो मुनीस महा अट मानी ॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू । चहत उड़ावन फूँकि पहारू ॥
biham̐si lakhana bole mṛdubānī | aho munīsa mahā aṭa mānī ||
puni puni mohi dekhāva kuṭhārū | cahata ur̤āvana phūm̐ki pahārū ||
5 श्लोक · 273 में से 361
लक्ष्मण मुस्कुराकर कोमल वाणी में कहते हैं: अहो मुनीश्वर, आप तो बड़े भारी योद्धा हैं, बार बार फरसा दिखाते हैं मानो फूँक से पहाड़ उड़ाना चाहते हों। यहाँ कोई कुम्हड़े की बतिया नहीं जो तर्जनी देखते ही मुरझा जाए। आपके फरसे और धनुषबाण देखकर मैंने कुछ अभिमान से कहा था, पर भृगुवंशी जानकर और जनेऊ देखकर आप जो कहें, क्रोध रोककर सह लूँगा। देवता, ब्राह्मण, हरिभक्त और गौ पर हमारे कुल में वीरता नहीं दिखाई जाती, क्योंकि इन्हें मारने में पाप है और इनसे हारने में अपकीर्ति। आप मारें तो भी हम आपके पैर ही पड़ेंगे। आपके वचन ही करोड़ों वज्र के समान हैं, धनुषबाण और फरसा व्यर्थ ही धारण करते हैं। अनुचित कहा हो तो क्षमा करें। यह सुनकर भृगुवंशमणि गम्भीर वाणी में बोले।
बिहँसि लखन बोले मृदुबानी । अहो मुनीस महा अट मानी ॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू । चहत उड़ावन फूँकि पहारू ॥
biham̐si lakhana bole mṛdubānī | aho munīsa mahā aṭa mānī ||
puni puni mohi dekhāva kuṭhārū | cahata ur̤āvana phūm̐ki pahārū ||
इहाँ कुम्हड़-बतिया कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥
देखि कुठार सरासन बाना । मैं कछु कहा सहित अभिमाना ॥
ihām̐ kumhar̤a-batiyā kou nāhīṃ | je tarajanī dekhi mari jāhīṃ ||
dekhi kuṭhāra sarāsana bānā | maiṃ kachu kahā sahita abhimānā ||
भृगुकुल समुझि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी ॥
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई । हमरें कुल इन्ह पर न सुराई ॥
bhṛgukula samujhi janeu bilokī | jo kachu kahahu sahaum̐ risa rokī ||
sura mahisura harijana aru gāī | hamareṃ kula inha para na surāī ||
बधें पाप अपकीरति हारें । मारतहूँ पाँ परिअ तुम्हारें ॥
कोटि कुलिस सम बचन तुम्हारा । व्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा ॥
badheṃ pāpa apakīrati hāreṃ | māratahūm̐ pām̐ paria tumhāreṃ ||
koṭi kulisa sama bacana tumhārā | vyartha dharahu dhanu bāna kuṭhārā ||
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ, छमहु महा मुनि धीर ।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि, बोले गिरा गभीर ॥
jo biloki anucita kaheum̐, chamahu mahā muni dhīra |
suni saroṣa bhṛgubaṃsamani, bole girā gabhīra ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0