बालकाण्ड

अध्याय 267: लक्ष्मण की क्रुद्ध दृष्टि, कोलाहल से सीता चिंतित

5 श्लोक · 267 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

लक्ष्मण की क्रुद्ध दृष्टि, कोलाहल से सीता चिंतित

साधु राजा आगे कहते हैं, जैसे कौआ गरुड़ का भाग चाहे, खरगोश सिंह का भाग चाहे, बिना कारण क्रोध करने वाला कुशल चाहे, शिवद्रोही सब संपत्ति चाहे, लोभी कीर्ति चाहे, कामी निष्कलंकता चाहे और हरि-चरणों से विमुख सुगति चाहे, हे राजाओ, वैसा ही तुम्हारा लालच है। कोलाहल सुनकर सीता डर गईं और सखियाँ उन्हें रानी के पास ले गईं। श्रीराम सहज भाव से गुरु के पास चले, मन में सीता के स्नेह का वर्णन करते हुए। रानियों सहित सीता चिंता में हैं कि अब विधाता क्या करेगा। राजाओं के वचन सुनकर लक्ष्मण इधर उधर देखते हैं, पर श्रीराम के डर से बोल नहीं पाते। लाल नेत्र और टेढ़ी भौंहों से वे राजाओं को क्रोध से ऐसे देखते हैं मानो मतवाले हाथियों का झुंड देखकर सिंह का बच्चा ललक रहा हो।

267.1

वैनतेय बलि जिमि चह कागू । जिमि सस चहइ नाग-अरि भागू ॥
जिमि वह कुसल अकारन कोही । सब सम्पदा चहइ सिव-द्रोही ॥

vainateya bali jimi caha kāgū | jimi sasa cahai nāga-ari bhāgū ||
jimi vaha kusala akārana kohī | saba sampadā cahai siva-drohī ||

267.2

लोभी लोलुप कल कीरति चहई । अकलङ्कता कि कामी लहई ॥
हरि-पद-विमुख सुगति जिमि चाहा । तस तुम्हार लालचु नरनाहा ॥

lobhī lolupa kala kīrati cahaī | akalaṅkatā ki kāmī lahaī ||
hari-pada-vimukha sugati jimi cāhā | tasa tumhāra lālacu naranāhā ||

267.3

कोलाहल सुनि सीय सकानी । सखीं लवाइ गईं जहँ रानी ॥
राम सुभायँ चले गुरु पाहीं । सिय-सनेह बरनत मन माहीं ॥

kolāhala suni sīya sakānī | sakhīṃ lavāi gaīṃ jaham̐ rānī ||
rāma subhāyam̐ cale guru pāhīṃ | siya-saneha baranata mana māhīṃ ||

267.4

रानिन्ह सहित सोचबस सीया । अब धौँ बिधिहि काह करनीया ॥
भूप बचन सुनि इत उत तकहीं । लखन राम-डर बोलि न सकहीं ॥

rāninha sahita socabasa sīyā | aba dhaum̐ bidhihi kāha karanīyā ||
bhūpa bacana suni ita uta takahīṃ | lakhana rāma-ḍara boli na sakahīṃ ||

दो॰ 267दोहा

अरुन-नयन भृकुटी-कुटिल, चितवत नृपन्ह सकोप ।
मनहुँ मत्त-गज-गन निरखि, सिंघकिसोरहि चोप ॥

aruna-nayana bhṛkuṭī-kuṭila, citavata nṛpanha sakopa |
manahum̐ matta-gaja-gana nirakhi, siṃghakisorahi copa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0