बालकाण्ड

अध्याय 262: आकाश और धरती में आनंद

5 श्लोक · 262 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

आकाश और धरती में आनंद

तुलसीदास जी कहते हैं, जो समाज मोह के वश धनुष रूपी जहाज पर चढ़ा था, वह रघुवर के बाहुबल रूपी सागर में डूब गया। प्रभु ने धनुष के दोनों टुकड़े धरती पर डाल दिए और सब सुखी हुए। विश्वामित्र प्रेम के गहरे जल से भरे पवित्र समुद्र जैसे हैं, श्रीराम के रूप रूपी पूर्णचंद्र को देखकर उनमें पुलक की बड़ी लहरें उठने लगीं। आकाश में नगाड़े बजे और देववधुएँ नाचने गाने लगीं। ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और मुनीश्वर प्रभु की प्रशंसा करते और आशीर्वाद देते हैं, फूल और मालाएँ बरसाते हैं, किन्नर मधुर गीत गाते हैं। जय जय की ध्वनि में धनुष टूटने का शब्द खो गया। बंदी विरद गाते हैं और लोग घोड़े, हाथी, धन, मणि और वस्त्र निछावर करते हैं।

262.1

प्रभु दोउ चाप-खंड महि डारे । देखि लोग सब भये सुखारे ॥
कौसिक रूप पयोनिधि पावन । प्रेम बारि अवगाह सुहावन ॥

prabhu dou cāpa-khaṃḍa mahi ḍāre | dekhi loga saba bhaye sukhāre ||
kausika rūpa payonidhi pāvana | prema bāri avagāha suhāvana ||

262.2

राम रूप राकेस निहारी । बढ़त बीचि पुलकावलि भारी ॥
बाजे नभ गहगहे निसाना । देवबधू नाचहिँ करि गाना ॥

rāma rūpa rākesa nihārī | bar̤hata bīci pulakāvali bhārī ||
bāje nabha gahagahe nisānā | devabadhū nācahim̐ kari gānā ||

262.3

ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा । प्रभुहि प्रसंसहिँ देहिँ असीसा ॥
बरषहिँ सुमन रङ्ग बहु माला । गावहिं किन्नर गीत रसाला ॥

brahmādika sura siddha munīsā | prabhuhi prasaṃsahim̐ dehim̐ asīsā ||
baraṣahim̐ sumana raṅga bahu mālā | gāvahiṃ kinnara gīta rasālā ||

262.4

रही भुवन भरि जय जय बानी । धनुष-भङ्ग धुनि जात न जानी ॥
मुदित कहहिँ जहँ तहँ नर नारी । भञ्जेउ राम सम्भु धनु भारी ॥

rahī bhuvana bhari jaya jaya bānī | dhanuṣa-bhaṅga dhuni jāta na jānī ||
mudita kahahim̐ jaham̐ taham̐ nara nārī | bhañjeu rāma sambhu dhanu bhārī ||

दो॰ 262दोहा

बन्दी मागध सूत गन, बिरद बदहिँ मतिधीर ।
करहिँ निछावरि लोग सब, हय गय धन मनि चीर ॥

bandī māgadha sūta gana, birada badahim̐ matidhīra |
karahim̐ nichāvari loga saba, haya gaya dhana mani cīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0