नाम प्रसाद सम्भु अबिनासी । साज-अमङ्गल मङ्गल-रासी ॥
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी । नाम-प्रसादब्रह्म-सुख-भोगी ॥
nāma prasāda sambhu abināsī | sāja-amaṅgala maṅgala-rāsī ||
suka sanakādi siddha muni jogī | nāma-prasādabrahma-sukha-bhogī ||
5 श्लोक · 26 में से 361
नाम के प्रसाद से शम्भु अविनाशी हैं और अमंगल वेश में भी मंगल की राशि हैं। शुकदेव, सनकादि और योगी नाम के प्रसाद से ब्रह्मसुख भोगते हैं। नारद ने नाम का प्रताप जाना। नाम जपकर प्रह्लाद भक्तशिरोमणि बने। ग्लानि से भरे ध्रुव ने हरिनाम जपा और अचल स्थान पाया। पवित्र नाम का स्मरण करके हनुमान ने राम को वश में कर रखा है। अजामिल, गज और गणिका हरिनाम से मुक्त हुए। नाम की बड़ाई कहाँ तक कहें, जब राम भी उसके सब गुण नहीं गा सकते। दोहा कहता है कि राम नाम कलियुग में कल्याण का कल्पवृक्ष है, जिसके स्मरण से भाँग जैसा तुलसीदास तुलसी के समान पवित्र हो गया।
नाम प्रसाद सम्भु अबिनासी । साज-अमङ्गल मङ्गल-रासी ॥
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी । नाम-प्रसादब्रह्म-सुख-भोगी ॥
nāma prasāda sambhu abināsī | sāja-amaṅgala maṅgala-rāsī ||
suka sanakādi siddha muni jogī | nāma-prasādabrahma-sukha-bhogī ||
नारद जानेउ नाम प्रतापू । जग-प्रिय-हरि हरि-हर-प्रिय आपू ॥
नाम जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू । भगत-सिरोमनि भे प्रहलादू ॥
nārada jāneu nāma pratāpū | jaga-priya-hari hari-hara-priya āpū ||
nāma japata prabhu kīnha prasādū | bhagata-siromani bhe prahalādū ||
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि-नाऊँ । पायउ अचल अनूपम ठाऊँ ॥
सुमिरि पवन-सुत पावन नामू । अपने बस करि राखे रामू ॥
dhruvam̐ sagalāni japeu hari-nāūm̐ | pāyau acala anūpama ṭhāūm̐ ||
sumiri pavana-suta pāvana nāmū | apane basa kari rākhe rāmū ||
अपत अजामिल गज गनिकाऊ । भये मुकुत हरि नाम प्रभाऊ ॥
कहउँ कहाँ लगि नाम बड़ाई । राम न सकहिं नाम-गुन गाई ॥
apata ajāmila gaja ganikāū | bhaye mukuta hari nāma prabhāū ||
kahaum̐ kahām̐ lagi nāma bar̤āī | rāma na sakahiṃ nāma-guna gāī ||
नाम राम को कल्पतरु, कलि कल्यान-निवास ।
जो सुमिरत भयो भाँग तें, तुलसी तुलसीदास ॥
nāma rāma ko kalpataru, kali kalyāna-nivāsa |
jo sumirata bhayo bhām̐ga teṃ, tulasī tulasīdāsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0