रघुबंसिन्ह महँ जहँ कोउ होई । तेहिं समाज अस कहइ न कोई ॥
कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान रघुकुल-मनि जानी ॥
raghubaṃsinha maham̐ jaham̐ kou hoī | tehiṃ samāja asa kahai na koī ||
kahī janaka jasi anucita bānī | bidyamāna raghukula-mani jānī ||
5 श्लोक · 253 में से 361
लक्ष्मण कहते हैं, रघुवंशियों में से जहाँ कोई भी हो, उस समाज में कोई ऐसी बात नहीं कहता, जैसी अनुचित बात रघुकुलमणि को उपस्थित जानकर भी जनक ने कही है। हे सूर्यकुल रूपी कमल के सूर्य, सुनिए, मैं अभिमान से कुछ नहीं कहता। यदि आपकी आज्ञा पाऊँ तो ब्रह्मांड को गेंद की तरह उठा लूँ, कच्चे घड़े की तरह फोड़ डालूँ और सुमेरु पर्वत को मूली की तरह तोड़ दूँ। हे भगवन, आपके प्रताप की महिमा के आगे यह बेचारा पुराना पिनाक क्या है। हे नाथ, आपके प्रताप के बल से मैं इसे कुकुरमुत्ते के डंठल की तरह तोड़ दूँ। यदि ऐसा न करूँ तो प्रभु के चरणों की शपथ, फिर कभी धनुष और तरकश हाथ में न लूँ।
रघुबंसिन्ह महँ जहँ कोउ होई । तेहिं समाज अस कहइ न कोई ॥
कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान रघुकुल-मनि जानी ॥
raghubaṃsinha maham̐ jaham̐ kou hoī | tehiṃ samāja asa kahai na koī ||
kahī janaka jasi anucita bānī | bidyamāna raghukula-mani jānī ||
सुनहु भानुकुल-पङ्कज भानू । कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू ॥
जौँ तुम्हार अनुसासन पावउँ । कन्दुक इव ब्रह्मांड उठावौं ॥
sunahu bhānukula-paṅkaja bhānū | kahaum̐ subhāu na kachu abhimānū ||
jaum̐ tumhāra anusāsana pāvaum̐ | kanduka iva brahmāṃḍa uṭhāvauṃ ||
काचे घट जिमि डारौं फोरी । सकउँ मेरु मूलक इव तोरी ॥
तव प्रताप महिमा भगवाना । को बापुरो पिनाक पुराना ॥
kāce ghaṭa jimi ḍārauṃ phorī | sakaum̐ meru mūlaka iva torī ||
tava pratāpa mahimā bhagavānā | ko bāpuro pināka purānā ||
नाथ जानि अस आयसु होऊ । कौतुकु करौँ बिलोकिअ सोऊ ॥
कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं । जोजन सत प्रमान लै धावौं ॥
nātha jāni asa āyasu hoū | kautuku karaum̐ bilokia soū ||
kamala nāla jimi cāpha car̤hāvauṃ | jojana sata pramāna lai dhāvauṃ ||
तोरौं छत्रक दंड जिमि, तव प्रताप बल नाथ ।
जौँ न करौँ प्रभु-पद सपथ, कर न धरउँ धनु भाथ ॥
torauṃ chatraka daṃḍa jimi, tava pratāpa bala nātha |
jaum̐ na karaum̐ prabhu-pada sapatha, kara na dharaum̐ dhanu bhātha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0