चली सङ्ग लै सखीं सयानी । गावत गीत मनोहर बानी ॥
सोह नवल-तनु सुन्दर सारी । जगत जननि अतुलित छबि भारी ॥
calī saṅga lai sakhīṃ sayānī | gāvata gīta manohara bānī ||
soha navala-tanu sundara sārī | jagata janani atulita chabi bhārī ||
5 श्लोक · 248 में से 361
सयानी सखियाँ सीता को साथ लेकर मनोहर गीत गाती चलीं। नवल शरीर पर सुंदर साड़ी है और सखियों ने अंग अंग सजाकर सब आभूषण पहनाए हैं। जगत-जननी की छवि अतुलनीय है। जब सीता ने रंगभूमि में पैर रखा तो सब स्त्री-पुरुष मोहित हो गए। देवताओं ने दुंदुभी बजाई, फूल बरसाए और अप्सराएँ गाने लगीं। कर-कमलों में जयमाला शोभित है। सीता ने सब राजाओं की ओर देखा और वे मोह के वश हो गए। चकित मन श्रीराम को खोज रहा था। मुनि के पास दोनों भाइयों को देखकर नेत्र ऐसे ललके मानो निधि पा ली हो। पर गुरुजनों की लाज और बड़ा समाज देखकर सीता सकुचा गईं और रघुवीर को हृदय में लाकर सखियों की ओर देखने लगीं।
चली सङ्ग लै सखीं सयानी । गावत गीत मनोहर बानी ॥
सोह नवल-तनु सुन्दर सारी । जगत जननि अतुलित छबि भारी ॥
calī saṅga lai sakhīṃ sayānī | gāvata gīta manohara bānī ||
soha navala-tanu sundara sārī | jagata janani atulita chabi bhārī ||
भूषन सकल सुदेस सुहाये । अङ्ग अङ्ग रचि सखिन्ह बनाये ॥
रङ्गभूमि जब सिय पग धारी । देखि रूप मोहे नर नारी ॥
bhūṣana sakala sudesa suhāye | aṅga aṅga raci sakhinha banāye ||
raṅgabhūmi jaba siya paga dhārī | dekhi rūpa mohe nara nārī ||
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई । बरषि प्रसून अपछरा गाई ॥
पानि-सरोज सोह जयमाला । अवचट चितये सकल भुआला ॥
haraṣi suranha duṃdubhīṃ bajāī | baraṣi prasūna apacharā gāī ||
pāni-saroja soha jayamālā | avacaṭa citaye sakala bhuālā ||
सीय चकित चित रामहि चाहा । भये मोह-बस सब नरनाहा ॥
मुनि समीप देखे दोउ भाई । लगे ललकि लोचन निधि पाई ॥
sīya cakita cita rāmahi cāhā | bhaye moha-basa saba naranāhā ||
muni samīpa dekhe dou bhāī | lage lalaki locana nidhi pāī ||
गुरजन लाज समाज बड़, देखि सीय सकुचानि ।
लागि बिलोकन सखिन्ह तन, रघुबीरहि उर आनि ॥
gurajana lāja samāja bar̤a, dekhi sīya sakucāni |
lāgi bilokana sakhinha tana, raghubīrahi ura āni ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0