बालकाण्ड

अध्याय 247: सीता की शोभा की कोई उपमा नहीं

5 श्लोक · 247 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सीता की शोभा की कोई उपमा नहीं

तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता की शोभा कही नहीं जा सकती, वे रूप और गुणों की खान जगदंबिका हैं। सब उपमाएँ छोटी लगती हैं, क्योंकि वे साधारण स्त्रियों से ली गई हैं, और उनसे वर्णन करके कुकवि कहलाने का अपयश कौन ले। सरस्वती बहुत बोलने वाली हैं, भवानी का शरीर आधा है, रति अनंग पति के कारण दुखी है, और लक्ष्मी के भाई विष और वारुणी हैं, तब वैदेही की उपमा किससे दें। यदि छवि रूपी अमृत का समुद्र हो, परम रूप कच्छप हो, शोभा रस्सी हो, शृंगार मंदराचल हो और कामदेव अपने हाथों से उसे मथे, तब जो लक्ष्मी उपजें, उनसे भी कवि सकुचाते हुए ही सीता की तुलना करेंगे।

247.1

सिय सोभा नहिँ जाइ बखानी । जगदम्बिका रूप-गुन-खानी ॥
उपमा सकल मोहि लघु लागीँ । प्राकृत नारि अङ्ग अनुरागीँ ॥

siya sobhā nahim̐ jāi bakhānī | jagadambikā rūpa-guna-khānī ||
upamā sakala mohi laghu lāgīm̐ | prākṛta nāri aṅga anurāgīm̐ ||

247.2

सीय बरनि तेहि उपमा देई । कुकबि कहाइ अजस को लेई ॥
जौँ पटतरिअ तीय महँ सीया । जग असि जुबति कहाँ कमनीया ॥

sīya barani tehi upamā deī | kukabi kahāi ajasa ko leī ||
jaum̐ paṭataria tīya maham̐ sīyā | jaga asi jubati kahām̐ kamanīyā ||

247.3

गिरा-मुखर तनु-अरध-भवानी । रति अति दुखित अतनु पति जानी ॥
विष-बारुनी-बन्धु प्रिय जेही । कहिय रमा सम किमि वैदेही ॥

girā-mukhara tanu-aradha-bhavānī | rati ati dukhita atanu pati jānī ||
viṣa-bārunī-bandhu priya jehī | kahiya ramā sama kimi vaidehī ||

247.4

जौँ छवि-सुधा-पयोनिधि होई । परम-रूप-मय कच्छप सोई ॥
सोभा-रजु मन्दर-सिङ्गारू । मथै पानि पङ्कज निज मारू ॥

jaum̐ chavi-sudhā-payonidhi hoī | parama-rūpa-maya kacchapa soī ||
sobhā-raju mandara-siṅgārū | mathai pāni paṅkaja nija mārū ||

दो॰ 247दोहा

एहि बिधि उपजै लच्छि जब, सुन्दरता सुख-मूल ।
तदपि सकोच समेत कबि, कहहिँ सीय समतूल ॥

ehi bidhi upajai lacchi jaba, sundaratā sukha-mūla |
tadapi sakoca sameta kabi, kahahim̐ sīya samatūla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0