बालकाण्ड

अध्याय 213: जनकपुर की शोभा

5 श्लोक · 213 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

जनकपुर की शोभा

नगर की सुन्दरता कही नहीं जाती; मन जहाँ जाता है, वहीं लुभा जाता है। बाज़ारों में मणियों के छज्जे ऐसे हैं मानो ब्रह्मा ने अपने हाथ से सँवारे हों, और कुबेर जैसे धनी व्यापारी अनेक वस्तुएँ लिए बैठे हैं। गलियाँ सदा सुगन्ध से सींची रहती हैं और भवन ऐसे चित्रित हैं मानो कामदेव ने चित्र बनाए हों। नगर के नर नारी सुन्दर, पवित्र, धर्मशील और ज्ञानी हैं। जनक का निवास देखकर देवता भी चकित होते हैं और परकोटा मानो सब लोकों की शोभा रोके खड़ा है। मणि और सोने के परदों वाले उजले महल हैं; सीताजी के निवास वाले भवन की शोभा कैसे कही जाए?

213.1

बनइ न बरनत नगर निकाई । जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई ॥
चारु बजार बिचित्र अँवारी । मनिमय बिधि जनु बिधि स्वकर सँवारी ॥

banai na baranata nagara nikāī | jahām̐ jāi mana taham̐im̐ lobhāī ||
cāru bajāra bicitra am̐vārī | manimaya bidhi janu bidhi svakara sam̐vārī ||

213.2

धनिक-बनिक बर धनद समाना । बैठे सकल बस्तु लेइ नाना ॥
चौहट सुन्दर गलीं सुहाई । सन्तत रहहिँ सुगन्ध सिँचाई ॥

dhanika-banika bara dhanada samānā | baiṭhe sakala bastu lei nānā ||
cauhaṭa sundara galīṃ suhāī | santata rahahim̐ sugandha sim̐cāī ||

213.3

मङ्गल-मय मन्दिर सब केरें । चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें ॥
पुर नर-नारि सुभग सुचि सन्ता । धरमसील ज्ञानी गुनवन्ता ॥

maṅgala-maya mandira saba kereṃ | citrita janu ratinātha citereṃ ||
pura nara-nāri subhaga suci santā | dharamasīla jñānī gunavantā ||

213.4

अति अनूप जहँ जनक-निवासू । बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू ॥
होत चकित चित कोट बिलोकी । सकल भुवन सोभा जनु रोकी ॥

ati anūpa jaham̐ janaka-nivāsū | bithakahiṃ bibudha biloki bilāsū ||
hota cakita cita koṭa bilokī | sakala bhuvana sobhā janu rokī ||

दो॰ 213दोहा

धवल-धाम मनि-पुरट-पट, सुघटित नाना भाँति ।
सिय-निवास सुन्दर-सदन, सोभा किमि कहि जाति ॥

dhavala-dhāma mani-puraṭa-paṭa, sughaṭita nānā bhām̐ti |
siya-nivāsa sundara-sadana, sobhā kimi kahi jāti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0