बालकाण्ड

अध्याय 212: गंगा-स्नान और मिथिला की ओर

5 श्लोक · 212 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

गंगा-स्नान और मिथिला की ओर

श्रीराम और लक्ष्मण मुनि के साथ गंगा तट पहुँचते हैं और विश्वामित्र सुनाते हैं कि देवनदी पृथ्वी पर कैसे आईं। प्रभु ऋषियों के साथ स्नान करते हैं और ब्राह्मणों को दान मिलते हैं। आगे चलकर वे शीघ्र विदेह नगर के निकट पहुँचते हैं और दोनों भाई उसकी रमणीयता देखकर प्रसन्न होते हैं: बावड़ियाँ, कुएँ, नदियाँ और सरोवर, अमृत जैसा जल और मणियों की सीढ़ियाँ। मतवाले भौंरे गुंजार करते हैं, रंग बिरंगे पक्षी कूजते हैं, कमल खिले हैं और शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन बहता है। पक्षियों से भरी फुलवारियाँ, बाग और वन, फूलते फलते, नगर के चारों ओर शोभित हैं।

212.1

चले राम लछिमन मुनि सङ्गा । गये जहाँ जग-पावनि गङ्गा ॥
गाधि-सूनु सब कथा सुनाई । जेहि प्रकार सुरसरि महि आई ॥

cale rāma lachimana muni saṅgā | gaye jahām̐ jaga-pāvani gaṅgā ||
gādhi-sūnu saba kathā sunāī | jehi prakāra surasari mahi āī ||

212.2

तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाये । बिबिध दान महिदेवन्हि पाये ॥
हरषि चले मुनि-वृन्द-सहाया । बेगि विदेह-नगर निअराया ॥

taba prabhu riṣinha sameta nahāye | bibidha dāna mahidevanhi pāye ||
haraṣi cale muni-vṛnda-sahāyā | begi videha-nagara niarāyā ||

212.3

पुर रम्यता राम जब देखी । हरषे अनुज समेत बिसेखी ॥
बापीं कूप सरित सर नाना । सलिल सुधा-सम मनि-सोपाना ॥

pura ramyatā rāma jaba dekhī | haraṣe anuja sameta bisekhī ||
bāpīṃ kūpa sarita sara nānā | salila sudhā-sama mani-sopānā ||

212.4

गुञ्जत मज्जु मत्त-रस भृङ्गा । कूजत कल बहु बरन बिहङ्गा ॥
बरन बरन बिकसे बन जाता । त्रिविधि समीर सदा सुख-दाता ॥

guñjata majju matta-rasa bhṛṅgā | kūjata kala bahu barana bihaṅgā ||
barana barana bikase bana jātā | trividhi samīra sadā sukha-dātā ||

दो॰ 212दोहा

सुमन बाटिका बाग बन, बिपुल बिहँग निवास ।
फूलत फलत सुपल्लवत, सोहत पुर चहुँ पास ॥

sumana bāṭikā bāga bana, bipula biham̐ga nivāsa |
phūlata phalata supallavata, sohata pura cahum̐ pāsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0