बालकाण्ड

अध्याय 211: चरण-स्पर्श से अहल्या का उद्धार

5 श्लोक · 211 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

चरण-स्पर्श से अहल्या का उद्धार

पावन चरणों का स्पर्श होते ही तप की राशि अहल्या अपने सच्चे रूप में प्रकट होती हैं। वे श्रीराम के सामने हाथ जोड़े खड़ी हैं; प्रेम से अधीर, मुख से वचन नहीं निकलता, और चरणों में लगकर आँसू बहाती हैं। फिर स्तुति करती हैं: मैं अपवित्र नारी हूँ और आप जगत को पवित्र करने वाले हैं; मैं शरण आई हूँ। मुनि का शाप बड़ा अनुग्रह था, जिससे मैंने हरि को आँख भरकर देखा। मैं कोई और वर नहीं माँगती; मेरा मन भौंरा बनकर उन चरणों का पराग पिए, जिनसे गंगा प्रकट हुईं और जिन्हें शिवजी सिर पर धरते हैं। बार बार चरणों में गिरकर वे आनन्द से पतिलोक जाती हैं। तुलसीदास अपने मन से कहते हैं, ऐसे प्रभु को भज।

211.छं॰ 1छन्द

परसत पद-पावन, सोक नसावन, प्रगट भई तप,-पुज्ज सही ।
देखत रघुनायक, जन-सुख-दायक, सनमुख होइ कर,-जोरि रही ॥
अति प्रेम अधीरा, पुलक-सरीरा, मुख नहिँ आवइ, बचन कही ।
अतिसय बड़भागी, चरनन्हि लागी, जुगल नयन जल,-धार बही ॥

parasata pada-pāvana, soka nasāvana, pragaṭa bhaī tapa,-pujja sahī |
dekhata raghunāyaka, jana-sukha-dāyaka, sanamukha hoi kara,-jori rahī ||
ati prema adhīrā, pulaka-sarīrā, mukha nahim̐ āvai, bacana kahī |
atisaya bar̤abhāgī, carananhi lāgī, jugala nayana jala,-dhāra bahī ||

211.छं॰ 2छन्द

धीरज मन कीन्हा, प्रभु कहँ चीन्हा, रघुपति कृपाँ भगति पाई ।
अति निर्मल बानीं, अस्तुति ठानी, ज्ञान-गम्य जय, रघुराई ॥
मैं नारि अपावन, प्रभु जग-पावन, रावन-रिपु जन,-सुखदाई ।
राजीव-बिलोचन, भव-भय-मोचन, पाहि पाहि सरनहिँ आई ॥

dhīraja mana kīnhā, prabhu kaham̐ cīnhā, raghupati kṛpām̐ bhagati pāī |
ati nirmala bānīṃ, astuti ṭhānī, jñāna-gamya jaya, raghurāī ||
maiṃ nāri apāvana, prabhu jaga-pāvana, rāvana-ripu jana,-sukhadāī |
rājīva-bilocana, bhava-bhaya-mocana, pāhi pāhi saranahim̐ āī ||

211.छं॰ 3छन्द

मुनि साप जो दीन्हा, अति भल कीन्हा, परम अनुग्रह, मैँ माना ।
देखेउँ भरि लोचन, हरि भव-मोचन, इहइ लाभ सङ्कर जाना ॥
बिनती प्रभु मोरी, मैं मति भोरी, नाथ न मागउँ बर आना ।
पद-कमल-परागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप करइ पाना ॥

muni sāpa jo dīnhā, ati bhala kīnhā, parama anugraha, maim̐ mānā |
dekheum̐ bhari locana, hari bhava-mocana, ihai lābha saṅkara jānā ||
binatī prabhu morī, maiṃ mati bhorī, nātha na māgaum̐ bara ānā |
pada-kamala-parāgā, rasa anurāgā, mama mana madhupa karai pānā ||

211.छं॰ 4छन्द

जेहिं पद सुरसरिता, परम पुनीता, प्रगट भई सिव,-सीस धरी ।
सोई पद-पङ्कज, जेहि पूजत अज, मम सिर धरेउ कृपाल हरी ॥
एहि भाँति सिधारी, गौतम नारी, बार बार हरि, चरन परी ।
जो अति मन भावा, सो बर पावा, गह पतिलोक अनन्द भरी ॥

jehiṃ pada surasaritā, parama punītā, pragaṭa bhaī siva,-sīsa dharī |
soī pada-paṅkaja, jehi pūjata aja, mama sira dhareu kṛpāla harī ||
ehi bhām̐ti sidhārī, gautama nārī, bāra bāra hari, carana parī |
jo ati mana bhāvā, so bara pāvā, gaha patiloka ananda bharī ||

दो॰ 211दोहा

अस प्रभु दीनबन्धु हरि, कारन रहित दयाल ।
तुलसिदास सठ ताहि भजु, छाड़ि कपट जंजाल ॥

asa prabhu dīnabandhu hari, kārana rahita dayāla |
tulasidāsa saṭha tāhi bhaju, chār̤i kapaṭa jaṃjāla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0