पावन चरणों का स्पर्श होते ही तप की राशि अहल्या अपने सच्चे रूप में प्रकट होती हैं। वे श्रीराम के सामने हाथ जोड़े खड़ी हैं; प्रेम से अधीर, मुख से वचन नहीं निकलता, और चरणों में लगकर आँसू बहाती हैं। फिर स्तुति करती हैं: मैं अपवित्र नारी हूँ और आप जगत को पवित्र करने वाले हैं; मैं शरण आई हूँ। मुनि का शाप बड़ा अनुग्रह था, जिससे मैंने हरि को आँख भरकर देखा। मैं कोई और वर नहीं माँगती; मेरा मन भौंरा बनकर उन चरणों का पराग पिए, जिनसे गंगा प्रकट हुईं और जिन्हें शिवजी सिर पर धरते हैं। बार बार चरणों में गिरकर वे आनन्द से पतिलोक जाती हैं। तुलसीदास अपने मन से कहते हैं, ऐसे प्रभु को भज।
मुनि साप जो दीन्हा, अति भल कीन्हा, परम अनुग्रह, मैँ माना । देखेउँ भरि लोचन, हरि भव-मोचन, इहइ लाभ सङ्कर जाना ॥ बिनती प्रभु मोरी, मैं मति भोरी, नाथ न मागउँ बर आना । पद-कमल-परागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप करइ पाना ॥
muni sāpa jo dīnhā, ati bhala kīnhā, parama anugraha, maim̐ mānā | dekheum̐ bhari locana, hari bhava-mocana, ihai lābha saṅkara jānā || binatī prabhu morī, maiṃ mati bhorī, nātha na māgaum̐ bara ānā | pada-kamala-parāgā, rasa anurāgā, mama mana madhupa karai pānā ||
जेहिं पद सुरसरिता, परम पुनीता, प्रगट भई सिव,-सीस धरी । सोई पद-पङ्कज, जेहि पूजत अज, मम सिर धरेउ कृपाल हरी ॥ एहि भाँति सिधारी, गौतम नारी, बार बार हरि, चरन परी । जो अति मन भावा, सो बर पावा, गह पतिलोक अनन्द भरी ॥
jehiṃ pada surasaritā, parama punītā, pragaṭa bhaī siva,-sīsa dharī | soī pada-paṅkaja, jehi pūjata aja, mama sira dhareu kṛpāla harī || ehi bhām̐ti sidhārī, gautama nārī, bāra bāra hari, carana parī | jo ati mana bhāvā, so bara pāvā, gaha patiloka ananda bharī ||