बालकाण्ड

अध्याय 210: मारीच-सुबाहु और अहल्या का आश्रम

7 श्लोक · 210 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

मारीच-सुबाहु और अहल्या का आश्रम

सवेरे श्रीराम मुनि से निर्भय होकर यज्ञ करने को कहते हैं और स्वयं रखवाली करते हैं। मारीच सहायकों के साथ दौड़ता है; श्रीराम उसे बिना फल का बाण मारते हैं जिससे वह सौ योजन दूर समुद्र पार जा गिरता है, फिर अग्निबाण से सुबाहु को जला देते हैं, और लक्ष्मण राक्षसों की सेना का संहार करते हैं। देवता और मुनि स्तुति करते हैं। कुछ दिन बाद मुनि धनुषयज्ञ की बात कहते हैं और श्रीराम हर्ष से साथ चलते हैं। मार्ग में एक आश्रम मिलता है जहाँ कोई जीव नहीं, केवल एक शिला है। पूछने पर ऋषि कथा कहते हैं: गौतम की पत्नी शाप से पत्थर बनकर धीरज से आपके चरणों की धूल चाहती है।

210.1

प्रात कहा मुनि सन रघुराई । निर्भय जज्ञ करहु तुम्ह जाई ॥
होम करन लागे मुनि झारी । आपु रहे मख कीं रखवारी ॥

prāta kahā muni sana raghurāī | nirbhaya jajña karahu tumha jāī ||
homa karana lāge muni jhārī | āpu rahe makha kīṃ rakhavārī ||

210.2

सुनि मारीच निसाचर क्रोही । लेइ सहाय धावा मुनि-द्रोही ॥
बिनु फर बान राम तेहि मारा । सत जोजन गा सागर पारा ॥

suni mārīca nisācara krohī | lei sahāya dhāvā muni-drohī ||
binu phara bāna rāma tehi mārā | sata jojana gā sāgara pārā ||

210.3

पावक-सर सुबाहु पुनि जारा । अनुज निसाचर कटक सँघारा ॥
मारि असुर द्विज-निर्भय-कारी । अस्तुति करहिँ देव-मुनि-झारी ॥

pāvaka-sara subāhu puni jārā | anuja nisācara kaṭaka sam̐ghārā ||
māri asura dvija-nirbhaya-kārī | astuti karahim̐ deva-muni-jhārī ||

210.4

तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया । रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया ॥
भगति हेतु बहु कथा पुराना । कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना ॥

taham̐ puni kachuka divasa raghurāyā | rahe kīnhi bipranha para dāyā ||
bhagati hetu bahu kathā purānā | kahe bipra jadyapi prabhu jānā ||

210.5

तब मुनि सादर कहा बुझाई । चरित एक प्रभु देखिय जाई ॥
धनुष-जज्ञ सुनि रघुकुल नाथा । हरषि चले मुनिबर के साथा ॥

taba muni sādara kahā bujhāī | carita eka prabhu dekhiya jāī ||
dhanuṣa-jajña suni raghukula nāthā | haraṣi cale munibara ke sāthā ||

210.6

आस्त्रम एक दीख मग माहीँ । खग मृग जीव जन्तु तहँ नाहीँ ॥
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी । सकल कथा रिषि कही बिसेखी ॥

āstrama eka dīkha maga māhīm̐ | khaga mṛga jīva jantu taham̐ nāhīm̐ ||
pūchā munihi silā prabhu dekhī | sakala kathā riṣi kahī bisekhī ||

दो॰ 210दोहा

गौतम-नारि साप बस, उपल देह धरि धीर ।
चरन-कमल-रज चाहति, कृपा करहु रघुबीर ॥

gautama-nāri sāpa basa, upala deha dhari dhīra |
carana-kamala-raja cāhati, kṛpā karahu raghubīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0