कपिपति रीछ निसाचर राजा । अङ्गदादि जे कीस-समाजा ॥
बन्दउँ सब के चरन सुहाये । अधम-सरीर राम जिन्ह पाये ॥
kapipati rīcha nisācara rājā | aṅgadādi je kīsa-samājā ||
bandaum̐ saba ke carana suhāye | adhama-sarīra rāma jinha pāye ||
6 श्लोक · 18 में से 361
तुलसीदास सुग्रीव, जाम्बवान, विभीषण, अंगद और पूरे वानर समाज को प्रणाम करते हैं, जिन्होंने अधम शरीर में भी श्रीराम को पा लिया। पक्षी, पशु, देवता, मनुष्य या असुर, जो भी निष्काम होकर रघुपति के चरणों का उपासक है, सबकी वन्दना है। शुकदेव, सनकादि, नारद और श्रेष्ठ मुनियों को वे धरती पर सिर रखकर प्रणाम करते हैं। फिर जगज्जननी जानकी को, जो करुणानिधान को अत्यन्त प्रिय हैं, मनाते हैं कि उनकी कृपा से निर्मल बुद्धि मिले। फिर मन, वचन और कर्म से कमलनयन, धनुषधारी, भक्तों की विपत्ति हरने वाले रघुनायक को प्रणाम करते हैं। दोहा कहता है कि सीता और राम वाणी और अर्थ, जल और लहर की तरह कहने भर को अलग हैं, और उन्हें दीन दुखी सबसे प्रिय हैं।
कपिपति रीछ निसाचर राजा । अङ्गदादि जे कीस-समाजा ॥
बन्दउँ सब के चरन सुहाये । अधम-सरीर राम जिन्ह पाये ॥
kapipati rīcha nisācara rājā | aṅgadādi je kīsa-samājā ||
bandaum̐ saba ke carana suhāye | adhama-sarīra rāma jinha pāye ||
रघुपति चरन उपासक जेते । खग मृग सुर नर असुर समेते ॥
बन्दउँ पद-सरोज सब केरे । जे बिनु काम राम के चेरे ॥
raghupati carana upāsaka jete | khaga mṛga sura nara asura samete ||
bandaum̐ pada-saroja saba kere | je binu kāma rāma ke cere ||
सुक सनकादि भगत मुनि नारद । जे मुनिवर बिज्ञान बिसारद ॥
प्रनवउँ सबहिँ धरनि धरि सीसा । करहु कृपा जन जानि मुनीसा ॥
suka sanakādi bhagata muni nārada | je munivara bijñāna bisārada ||
pranavaum̐ sabahim̐ dharani dhari sīsā | karahu kṛpā jana jāni munīsā ||
जनक-सुता जग-जननि जानकी । अतिसय प्रिय करुना निधान की ॥
ताके जुग-पद-कमल मनावउँ । जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ ॥
janaka-sutā jaga-janani jānakī | atisaya priya karunā nidhāna kī ||
tāke juga-pada-kamala manāvaum̐ | jāsu kṛpām̐ niramala mati pāvaum̐ ||
पुनि मन-बचन-करम रघुनायक । चरन-कमल बन्दउँ सब लायक ॥
राजिव-नयन धरें धनु-सायक । भगत-बिपति-भञ्जन सुख दायक ॥
puni mana-bacana-karama raghunāyaka | carana-kamala bandaum̐ saba lāyaka ||
rājiva-nayana dhareṃ dhanu-sāyaka | bhagata-bipati-bhañjana sukha dāyaka ||
गिरा-अरथ जल-बीचि सम, कहिअत भिन्न न भिन्न ।
बदउँ सीता-राम-पद, जिन्हहि परम प्रिय खिन्न ॥
girā-aratha jala-bīci sama, kahiata bhinna na bhinna |
badaum̐ sītā-rāma-pada, jinhahi parama priya khinna ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0