जानि नृपहि आपन आधीना । बोला तापस कपट-प्रबीना ॥
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही । जग नाहिँ न दुर्लभ कछु मोही ॥
jāni nṛpahi āpana ādhīnā | bolā tāpasa kapaṭa-prabīnā ||
satya kahaum̐ bhūpati sunu tohī | jaga nāhim̐ na durlabha kachu mohī ||
5 श्लोक · 168 में से 361
राजा को अपने अधीन जानकर कपट में प्रवीण तपस्वी बोला, हे भूपति, सत्य कहता हूँ, संसार में मेरे लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं। मैं तुम्हारा काम अवश्य करूँगा, क्योंकि तुम मन, कर्म और वचन से मेरे भक्त हो। योग, युक्ति, तप और मन्त्र का प्रभाव तभी फलता है जब उसे छिपाकर किया जाए। हे नरेश, यदि मैं रसोई बनाऊँ और तुम परोसो, और कोई मुझे न जाने, तो जो जो वह अन्न खाएगा, वही तुम्हारी आज्ञा मानेगा। फिर उनके घर जो कोई भोजन करेगा, वह भी तुम्हारे वश हो जाएगा। हे राजन, जाकर यह उपाय रचो और वर्ष भर का संकल्प करो। नित्य नए एक लाख ब्राह्मणों को परिवार सहित निमन्त्रित करना, और तुम्हारे संकल्प के लिए मैं प्रतिदिन भोजन बनाऊँगा।
जानि नृपहि आपन आधीना । बोला तापस कपट-प्रबीना ॥
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही । जग नाहिँ न दुर्लभ कछु मोही ॥
jāni nṛpahi āpana ādhīnā | bolā tāpasa kapaṭa-prabīnā ||
satya kahaum̐ bhūpati sunu tohī | jaga nāhim̐ na durlabha kachu mohī ||
अवसि काज मैँ करिहउँ तोरा । मन तन बचन भगत तैँ मोरा ॥
जोग-जुगुति तप मन्त्र प्रभाऊ । फलइ तबहिँ जब करिय दुराऊ ॥
avasi kāja maim̐ karihaum̐ torā | mana tana bacana bhagata taim̐ morā ||
joga-juguti tapa mantra prabhāū | phalai tabahim̐ jaba kariya durāū ||
जौँ नरेस मैँ करउँ रसोई । तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई ॥
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई । सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई ॥
jaum̐ naresa maim̐ karaum̐ rasoī | tumha parusahu mohi jāna na koī ||
anna so joi joi bhojana karaī | soi soi tava āyasu anusaraī ||
पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ । तव बस होइ भूप सुनु सोऊ ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू । सम्बत भरि सङ्कलप करेहू ॥
puni tinha ke gṛha jevam̐i joū | tava basa hoi bhūpa sunu soū ||
jāi upāya racahu nṛpa ehū | sambata bhari saṅkalapa karehū ||
नित नूतन द्विज सहस-सत, बरेहु सहित परिवार ।
मैँ तुम्हरे सङ्कलप लगि, दिनहिंकरिब जेवनार ॥
nita nūtana dvija sahasa-sata, barehu sahita parivāra |
maim̐ tumhare saṅkalapa lagi, dinahiṃkariba jevanāra ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0