बालकाण्ड

अध्याय 167: नगर चलने की राजा की विनती

5 श्लोक · 167 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

नगर चलने की राजा की विनती

तपस्वी बोला, हे राजन, संसार में उपाय तो बहुत हैं, पर वे कष्ट से सधते हैं और सधें या न सधें। एक उपाय बहुत सुगम है, परन्तु उसमें एक कठिनाई है। वह युक्ति मेरे ही अधीन है, पर मेरा तुम्हारे नगर जाना नहीं हो सकता। जन्म से मैं किसी के घर या गाँव नहीं गया। न जाऊँ तो तुम्हारा काम बिगड़ता है, आज बड़ा असमंजस आ पड़ा है। यह सुनकर राजा कोमल वाणी में बोले, हे नाथ, वेद ऐसी नीति कहते हैं कि बड़े लोग छोटों पर स्नेह करते हैं। पर्वत अपने सिर पर सदा तृण धरते हैं, अथाह समुद्र अपने सिर पर फेन धारण करता है। ऐसा कहकर राजा ने चरण पकड़ लिए, हे स्वामी, कृपा कीजिए, सज्जन दीनों पर दया करते हैं।

167.1

सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीँ । कष्टसाध्य पुनि होहिँ कि नाहीँ ॥
अहइ एक अति सुगम उपाई । तहाँ परन्तु एक कठिनाई ॥

sunu nṛpa bibidha jatana jaga māhīm̐ | kaṣṭasādhya puni hohim̐ ki nāhīm̐ ||
ahai eka ati sugama upāī | tahām̐ parantu eka kaṭhināī ||

167.2

मम आधीन जुगुति नृप सोई । मोर जाब तव नगर न होई ॥
आजु लगें अरु जब तेँ भयऊँ । काहू के गृह ग्राम न गयऊँ ॥

mama ādhīna juguti nṛpa soī | mora jāba tava nagara na hoī ||
āju lageṃ aru jaba tem̐ bhayaūm̐ | kāhū ke gṛha grāma na gayaūm̐ ||

167.3

जौँ न जाउँ तौ होइ अकाजू । बना आई असमञ्जस आजू ॥
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी । नाथ निगम असि नीति बखानी ॥

jaum̐ na jāum̐ tau hoi akājū | banā āī asamañjasa ājū ||
suni mahīsa boleu mṛdu bānī | nātha nigama asi nīti bakhānī ||

167.4

बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीँ । गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीँ ॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू । सन्तत धरनि धरत सिर रेनू ॥

bar̤e saneha laghunha para karahīm̐ | giri nija sirani sadā tṛna dharahīm̐ ||
jaladhi agādha mauli baha phenū | santata dharani dharata sira renū ||

दो॰ 167दोहा

अस कहि गहे नरेस पद, स्वामी होहु कृपाल ।
मोहि लागि दुख सहिय प्रभु, सज्जन दीनदयाल ॥

asa kahi gahe naresa pada, svāmī hohu kṛpāla |
mohi lāgi dukha sahiya prabhu, sajjana dīnadayāla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0