बालकाण्ड

अध्याय 164: अमरता और अखण्ड राज्य का वर

5 श्लोक · 164 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

अमरता और अखण्ड राज्य का वर

तपस्वी कहता है, तुम्हारा नाम प्रतापभानु है और राजा सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे। हे राजन, गुरु की कृपा से मैं सब जानता हूँ, पर अपनी हानि समझकर कहता नहीं। अब मैं प्रसन्न हूँ, संशय मत करो, हे राजन, जो मन को भाए वह माँगो। सुन्दर वचन सुनकर राजा प्रसन्न हुए और चरण पकड़कर बहुत प्रकार विनती की। हे कृपासिन्धु मुनि, आपके दर्शन से ही चारों पदार्थ मेरी मुट्ठी में हैं। फिर भी स्वामी को प्रसन्न देखकर दुर्लभ वर माँगकर शोकरहित हो जाऊँ। मेरा शरीर बुढ़ापे, मृत्यु और दुख से रहित हो, युद्ध में मुझे कोई न जीते, और पृथ्वी पर सौ कल्प तक मेरा शत्रुहीन, एकछत्र राज्य रहे।

164.1

नाम तुम्हार प्रताप-दिनेसा । सत्यकेतु तव पिता नरेसा ॥
गुरु प्रसाद सब जानिय राजा । कहिअ न आपन जानि अकाजा ॥

nāma tumhāra pratāpa-dinesā | satyaketu tava pitā naresā ||
guru prasāda saba jāniya rājā | kahia na āpana jāni akājā ||

164.2

देखि तात तव सहज सुधाई । प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई ॥
उपजि परी ममता मन मोरें । कहउँ कथा निज पूछे तोरें ॥

dekhi tāta tava sahaja sudhāī | prīti pratīti nīti nipunāī ||
upaji parī mamatā mana moreṃ | kahaum̐ kathā nija pūche toreṃ ||

164.3

अब प्रसन्न मैं संसय नाहीँ । माँगु जो भूप भाव मन माहीँ ॥
सुनि सुबचन भूपति हरषाना । गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना ॥

aba prasanna maiṃ saṃsaya nāhīm̐ | mām̐gu jo bhūpa bhāva mana māhīm̐ ||
suni subacana bhūpati haraṣānā | gahi pada binaya kīnhi bidhi nānā ||

164.4

कृपासिन्धु मुनि दरसन तोरें । चारि पदारथ करतल मोरें ॥
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी । माँगि अगम बर होउँ असोकी ॥

kṛpāsindhu muni darasana toreṃ | cāri padāratha karatala moreṃ ||
prabhuhi tathāpi prasanna bilokī | mām̐gi agama bara houm̐ asokī ||

दो॰ 164दोहा

जरा-मरन-दुख रहित तनु, समर जितै जनि कोउ ।
एक-छत्र रिपु-हीन महि, राज कलप सत होउ ॥

jarā-marana-dukha rahita tanu, samara jitai jani kou |
eka-chatra ripu-hīna mahi, rāja kalapa sata hou ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0