बालकाण्ड

अध्याय 156: शिकार में विशाल सूअर

5 श्लोक · 156 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

शिकार में विशाल सूअर

राजा के हृदय में किसी फल की चाह न थी। वे विवेकी और परम सुजान थे और मन, वचन तथा कर्म से जो भी धर्म करते, सब वासुदेव को अर्पित कर देते थे। एक बार राजा उत्तम घोड़े पर चढ़कर, शिकार का सब साज सजाकर विन्ध्याचल के घने वन में गए और वहाँ बहुत से पवित्र मृग मारे। वन में फिरते हुए राजा ने एक सूअर देखा, मानो चन्द्रमा को ग्रसकर राहु वन में छिपा हो। उसके टेढ़े दाँत उसी चन्द्रमा जैसे चमकते थे। घोड़े की आहट पाकर वह घुरघुराता हुआ कान उठाए चौंककर देखने लगा। नीले पर्वत के शिखर जैसा विशाल सूअर देखकर राजा घोड़े को चाबुक मारकर तेजी से उसकी ओर दौड़े।

156.1

हृदयँ न कछु फल अनुसन्धाना । भूप बिबेकी परम सुजाना ॥
करइ जे धरम करम मन बानी । वासुदेव अर्पित नृप-ज्ञानी ॥

hṛdayam̐ na kachu phala anusandhānā | bhūpa bibekī parama sujānā ||
karai je dharama karama mana bānī | vāsudeva arpita nṛpa-jñānī ||

156.2

चढ़ि बर बाजि बार एक राजा । मृगया कर सब साजि समाजा ॥
बिन्ध्याचल गभीर बन गयऊ । मृग पुनीत बहु मारत भयऊ ॥

car̤hi bara bāji bāra eka rājā | mṛgayā kara saba sāji samājā ||
bindhyācala gabhīra bana gayaū | mṛga punīta bahu mārata bhayaū ||

156.3

फिरत बिपिन नृप दीख बराहू । जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू ॥
बड़ बिधु नहिँ समात मुख माहीँ । मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीँ ॥

phirata bipina nṛpa dīkha barāhū | janu bana dureu sasihi grasi rāhū ||
bar̤a bidhu nahim̐ samāta mukha māhīm̐ | manahum̐ krodha basa ugilata nāhīm̐ ||

156.4

कोल कराल दसन छबि गाई । तनु बिसाल पीवर अधिकाई ॥
घुरुघुरात हय आरौ पाये । चकित बिलोकत कान उठाये ॥

kola karāla dasana chabi gāī | tanu bisāla pīvara adhikāī ||
ghurughurāta haya ārau pāye | cakita bilokata kāna uṭhāye ||

दो॰ 156दोहा

नील-महीधर-सिखर सम, देखि बिसाल बराह ।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप, हाँकि न होइ निबाह ॥

nīla-mahīdhara-sikhara sama, dekhi bisāla barāha |
capari caleu haya suṭuki nṛpa, hām̐ki na hoi nibāha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0