भूप प्रताप-भानु बल पाई । कामधेनु भइ भूमि सुहाई ॥
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी । घरम-सील सुन्दर नर नारी ॥
bhūpa pratāpa-bhānu bala pāī | kāmadhenu bhai bhūmi suhāī ||
saba dukha barajita prajā sukhārī | gharama-sīla sundara nara nārī ||
5 श्लोक · 155 में से 361
राजा प्रतापभानु के बल से पृथ्वी सुहावनी कामधेनु बन गई। प्रजा सब दुखों से रहित और सुखी थी,। मन्त्री धर्मरुचि की हरि के चरणों में प्रीति थी और वह राजा के हित के लिए उन्हें नित्य नीति सिखाता था। राजा गुरु, देवता, सन्त, पितर और ब्राह्मण सबकी सदा सेवा करते थे। वेद में राजा के जो धर्म बताए गए हैं, वे सब आदर और सुख मानकर करते थे। प्रतिदिन अनेक प्रकार के दान देते और उत्तम शास्त्र, वेद और पुराण सुनते थे। उन्होंने बहुत सी बावड़ियाँ, कुएँ, तालाब, फुलवारियाँ और सुन्दर बाग बनवाए। ब्राह्मणों के घर और देवताओं के सुन्दर मन्दिर बनवाए,। पुराणों और वेदों में जितने यज्ञ कहे गए हैं, राजा ने प्रेम सहित एक एक करके हजार हजार बार किए।
भूप प्रताप-भानु बल पाई । कामधेनु भइ भूमि सुहाई ॥
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी । घरम-सील सुन्दर नर नारी ॥
bhūpa pratāpa-bhānu bala pāī | kāmadhenu bhai bhūmi suhāī ||
saba dukha barajita prajā sukhārī | gharama-sīla sundara nara nārī ||
सचिव धरमरुचि हरि-पद-प्रीती । नृप-हित-हेतु सिखव नित नीती ॥
गुरु सुर सन्त पितर महिदेवा । करइ सदा नृप सब के सेवा ॥
saciva dharamaruci hari-pada-prītī | nṛpa-hita-hetu sikhava nita nītī ||
guru sura santa pitara mahidevā | karai sadā nṛpa saba ke sevā ||
भूप-धरम जे बेद बखाने । सकल करइ सादर सुख माने ॥
दिन-प्रति देइ बिबिध बिधि दाना । सुनइ सास्त्र बर बेद पुराना ॥
bhūpa-dharama je beda bakhāne | sakala karai sādara sukha māne ||
dina-prati dei bibidha bidhi dānā | sunai sāstra bara beda purānā ||
नाना बापीं कूप तड़ागा । सुमन-बाटिका सुन्दर बागा ॥
बिप्र-भवन सुर-भवन सुहाये । सब तीरथन्ह विचित्र बनाये ॥
nānā bāpīṃ kūpa tar̤āgā | sumana-bāṭikā sundara bāgā ||
bipra-bhavana sura-bhavana suhāye | saba tīrathanha vicitra banāye ||
जहँ लगि कहे पुरान स्त्रुति, एक एक सब जाग ।
बार सहस्र सहस्र नृप, किये सहित अनुराग ॥
jaham̐ lagi kahe purāna struti, eka eka saba jāga |
bāra sahasra sahasra nṛpa, kiye sahita anurāga ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0