बालकाण्ड

अध्याय 15: सरस्वती, गंगा और शिव पार्वती की कृपा

7 श्लोक · 15 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

सरस्वती, गंगा और शिव पार्वती की कृपा

तुलसीदास शारदा और गंगा को प्रणाम करते हैं: एक कहने और सुनने से अज्ञान हरती है, दूसरी स्नान और पान से पाप। वे महेश और भवानी को गुरु, पिता और माता मानकर प्रणाम करते हैं, जो दीनबन्धु हैं, सीतापति के सेवक, स्वामी और सखा हैं, और तुलसी के निःस्वार्थ हितैषी हैं। कलियुग देखकर शिव और गिरिजा ने शाबर मन्त्र रचे, जिनके अक्षर बेमेल हैं और अर्थ स्पष्ट नहीं, फिर भी महेश के प्रताप से उनका प्रभाव प्रत्यक्ष है। वे ही महेश अनुकूल हैं, इसलिए कवि यह कथा कहेंगे, और शिव की कृपा से उनकी कविता चन्द्रमा और तारों से सजी रात जैसी सोहेगी। यदि हर और गौरी की कृपा सच्ची है, तो भाषा की इस कविता का बताया प्रभाव भी सच हो।

15.1

पुनि बन्दउँ सारद सुरसरिता । जुगल पुनीत मनोहर-चरिता ॥
मज्जन पान पाप हर एका । कहत सुनत एक हर अबिबेका ॥

puni bandaum̐ sārada surasaritā | jugala punīta manohara-caritā ||
majjana pāna pāpa hara ekā | kahata sunata eka hara abibekā ||

15.2

गुरु पितु मातु महेस-भवानी । प्रनवउँ दीनबन्धु दिन-दानी ॥
सेवक स्वामि सखा सिय-पी के । हित निरुपधि सब विधि तुलसी के ॥

guru pitu mātu mahesa-bhavānī | pranavaum̐ dīnabandhu dina-dānī ||
sevaka svāmi sakhā siya-pī ke | hita nirupadhi saba vidhi tulasī ke ||

15.3

कलि बिलोकि जग-हित हर-गिरिजा । साबर मन्त्र जाल जिन्ह सिरिजा ॥
अनमिल आखर अरथ न जापू । प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ॥

kali biloki jaga-hita hara-girijā | sābara mantra jāla jinha sirijā ||
anamila ākhara aratha na jāpū | pragaṭa prabhāu mahesa pratāpū ||

15.4

सो महेस मोहि पर अनुकूला । करिहिं कथा मुद-मङ्गल-मूला ॥
सुमिरि सिवा-सिव पाइ पसाऊ । बरनउँ रामचरित चित-चाऊ ॥

so mahesa mohi para anukūlā | karihiṃ kathā muda-maṅgala-mūlā ||
sumiri sivā-siva pāi pasāū | baranaum̐ rāmacarita cita-cāū ||

15.5

भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती । ससि-समाज मिलि मनहुँ सुराती ॥
जे एहि कथहि सनेह-समेता । कहिहहिँ सुनिहहिँ समुझि सचेता ॥

bhaniti mori siva kṛpām̐ bibhātī | sasi-samāja mili manahum̐ surātī ||
je ehi kathahi saneha-sametā | kahihahim̐ sunihahim̐ samujhi sacetā ||

15.6

होइहहिँ राम-चरन-अनुरागी । कलि मल रहित सुमङ्गल-भागी ॥

hoihahim̐ rāma-carana-anurāgī | kali mala rahita sumaṅgala-bhāgī ||

दो॰ 15दोहा

सपनेहुँ साँचेहु मोहि पर, जौँ हर-गौरि-पसाउ ।
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब, भाषा-भनिति-प्रभाउ ॥

sapanehum̐ sām̐cehu mohi para, jaum̐ hara-gauri-pasāu |
tau phura hou jo kaheum̐ saba, bhāṣā-bhaniti-prabhāu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0