सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी । धरि धीरज बोले मृदु बानी ॥
नाथ देखि पद-कमल तुम्हारे । अब पूरे सब काम हमारे ॥
suni prabhu bacana jori juga pānī | dhari dhīraja bole mṛdu bānī ||
nātha dekhi pada-kamala tumhāre | aba pūre saba kāma hamāre ||
5 श्लोक · 149 में से 361
प्रभु के वचन सुनकर मनु दोनों हाथ जोड़कर धीरज धरकर कोमल वाणी में बोले, हे नाथ, आपके चरणकमल देखकर अब हमारी सब कामनाएँ पूरी हो गईं। फिर भी मन में एक बड़ी लालसा है, जिसे सुगम या अगम कुछ कहते नहीं बनता। आपके लिए देना बहुत सुगम है, पर अपनी कृपणता के कारण मुझे वह अगम लगती है। जैसे कोई दरिद्र कल्पवृक्ष पाकर भी बहुत सम्पत्ति माँगने में सकुचाता है, वैसा ही संशय मेरे हृदय में है। आप अन्तर्यामी हैं, मनोरथ पूरा कीजिए। प्रभु बोले, हे राजन, संकोच छोड़कर माँगो, तुम्हें न देने योग्य मेरे पास कुछ नहीं। तब मनु ने कहा, हे दानियों के शिरोमणि, कृपानिधि, मैं सच्चे भाव से कहता हूँ, आपसे क्या छिपाना, मैं आपके समान पुत्र चाहता हूँ।
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी । धरि धीरज बोले मृदु बानी ॥
नाथ देखि पद-कमल तुम्हारे । अब पूरे सब काम हमारे ॥
suni prabhu bacana jori juga pānī | dhari dhīraja bole mṛdu bānī ||
nātha dekhi pada-kamala tumhāre | aba pūre saba kāma hamāre ||
एक लालसा बड़ि उर माहीँ । सुगम अगम कहि जाति सो नाहीँ ॥
तुम्हहिँ देत अति सुगम गोसाँई । अगम लाग मोहि निज कृपनाईं ॥
eka lālasā bar̤i ura māhīm̐ | sugama agama kahi jāti so nāhīm̐ ||
tumhahim̐ deta ati sugama gosām̐ī | agama lāga mohi nija kṛpanāīṃ ||
जथा दरिद्र कल्पतरु पाई । बहु सम्पति माँगत सकुचाई ॥
तासु प्रभाव जान नहिँ सोई । तथा हृदयँ मम संसय होई ॥
jathā daridra kalpataru pāī | bahu sampati mām̐gata sakucāī ||
tāsu prabhāva jāna nahim̐ soī | tathā hṛdayam̐ mama saṃsaya hoī ||
सो तुम्ह जानहु अन्तरजामी । पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी ॥
सकुच बिहाइ माँगु नप मोही । मोरें नहिँ अदेय कछु तोही ॥
so tumha jānahu antarajāmī | puravahu mora manoratha svāmī ||
sakuca bihāi mām̐gu napa mohī | moreṃ nahim̐ adeya kachu tohī ||
दानि-सिरोमनि कृपानिधि, नाथ कहउँ सतिभाउ ।
चाहउँ तुम्हहिँ समान सुत, प्रभु सन कवन दुराउ ॥
dāni-siromani kṛpānidhi, nātha kahaum̐ satibhāu |
cāhaum̐ tumhahim̐ samāna suta, prabhu sana kavana durāu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0