बालकाण्ड

अध्याय 143: मनु और शतरूपा नैमिषारण्य में

5 श्लोक · 143 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

मनु और शतरूपा नैमिषारण्य में

राजा ने हठपूर्वक पुत्र को राज्य दे दिया और पत्नी सहित वन को गए। अत्यन्त पवित्र और साधकों को सिद्धि देने वाला तीर्थ नैमिष विख्यात है, जहाँ मुनियों और सिद्धों का समाज बसता है। मनु प्रसन्न हृदय से वहीं चले। मार्ग में जाते हुए वे धीरबुद्धि दम्पति ऐसे सुशोभित थे मानो ज्ञान और भक्ति शरीर धरकर चल रहे हों। गोमती के तट पर पहुँचकर उन्होंने हर्ष से निर्मल जल में स्नान किया। धर्मधुरन्धर राजर्षि जानकर सिद्ध, मुनि और ज्ञानी उनसे मिलने आए और वहाँ के सब सुन्दर तीर्थों में उन्हें आदर से स्नान कराया। दुर्बल शरीर, मुनियों के वस्त्र पहने, वे सन्तों के समाज में नित्य पुराण सुनते थे। वे प्रेम से द्वादशाक्षर मन्त्र जपते थे और उनका मन वासुदेव के चरणकमलों में लगा रहता था।

143.1

बरबस राज सुतहि नृप दीन्हा । नारि समेत गवन बन कीन्हा ॥
तीरथ बर नैमिष बिख्याता । अति पुनीत साधक-सिधि-दाता ॥

barabasa rāja sutahi nṛpa dīnhā | nāri sameta gavana bana kīnhā ||
tīratha bara naimiṣa bikhyātā | ati punīta sādhaka-sidhi-dātā ||

143.2

बसहिँ तहाँ मुनि-सिद्ध-समाजा । तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा ॥
पन्थ जात सोहहिं मति-धीरा । ज्ञान-भगति जनु धरें सरीरा ॥

basahim̐ tahām̐ muni-siddha-samājā | taham̐ hiyam̐ haraṣi caleu manu rājā ||
pantha jāta sohahiṃ mati-dhīrā | jñāna-bhagati janu dhareṃ sarīrā ||

143.3

पहुँचे जाइ धेनुमति-तीरा । हरषि नहाने निरमल नीरा ॥
आये मिलन सिद्धि मुनि ज्ञानी । धरम-धुरन्धर नृपरिषि जानी ॥

pahum̐ce jāi dhenumati-tīrā | haraṣi nahāne niramala nīrā ||
āye milana siddhi muni jñānī | dharama-dhurandhara nṛpariṣi jānī ||

143.4

जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाये । मुनिन्ह सकल सादर करवाये ॥
कृस-सरीर मुनि-पट परिधाना । सत-समाज नित सुनहिँ पुराना ॥

jaham̐ jaham̐ tīratha rahe suhāye | muninha sakala sādara karavāye ||
kṛsa-sarīra muni-paṭa paridhānā | sata-samāja nita sunahim̐ purānā ||

दो॰ 143दोहा

द्वादस अच्छर मन्त्र पुनि, जपहिँ सहित अनुराग ।
बासुदेव-पद-पङ्करुह, दम्पति मन अति लाग ॥

dvādasa acchara mantra puni, japahim̐ sahita anurāga |
bāsudeva-pada-paṅkaruha, dampati mana ati lāga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0