शिवजी इस प्रसंग को समेटते हैं। इस प्रकार हरि के जन्म और कर्म अनेक, सुन्दर, सुखद और विचित्र हैं। कल्प कल्प में प्रभु अवतार लेते हैं और नाना प्रकार के सुन्दर चरित करते हैं। मुनियों ने हर बार कथा गाई, इसलिए सयाने भिन्न कथाएँ सुनकर आश्चर्य नहीं करते। हरि अनन्त हैं और हरिकथा भी अनन्त है, सब सन्त उसे अनेक प्रकार से कहते सुनते हैं। श्रीरामचन्द्र के सुहावने चरित करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते। हे भवानी, यह प्रसंग इसलिए कहा कि हरि की माया ज्ञानी मुनियों को भी मोहित कर देती है। प्रभु कौतुकी, शरणागत के हितकारी, सेवा से सुलभ और सब दुख हरने वाले हैं। देवता, मनुष्य, मुनि कोई ऐसा नहीं जिसे प्रबल माया न मोहे, यह विचारकर महामाया के स्वामी को भजना चाहिए।