बालकाण्ड

अध्याय 140: हरि अनन्त, हरिकथा अनन्त

5 श्लोक · 140 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

हरि अनन्त, हरिकथा अनन्त

शिवजी इस प्रसंग को समेटते हैं। इस प्रकार हरि के जन्म और कर्म अनेक, सुन्दर, सुखद और विचित्र हैं। कल्प कल्प में प्रभु अवतार लेते हैं और नाना प्रकार के सुन्दर चरित करते हैं। मुनियों ने हर बार कथा गाई, इसलिए सयाने भिन्न कथाएँ सुनकर आश्चर्य नहीं करते। हरि अनन्त हैं और हरिकथा भी अनन्त है, सब सन्त उसे अनेक प्रकार से कहते सुनते हैं। श्रीरामचन्द्र के सुहावने चरित करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते। हे भवानी, यह प्रसंग इसलिए कहा कि हरि की माया ज्ञानी मुनियों को भी मोहित कर देती है। प्रभु कौतुकी, शरणागत के हितकारी, सेवा से सुलभ और सब दुख हरने वाले हैं। देवता, मनुष्य, मुनि कोई ऐसा नहीं जिसे प्रबल माया न मोहे, यह विचारकर महामाया के स्वामी को भजना चाहिए।

140.1

एहि बिधि जनम करम हरि केरे । सुन्दर सुखद बिचित्र घनेरे ॥
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीँ । चारु चरित नाना विधि करहीँ ॥

ehi bidhi janama karama hari kere | sundara sukhada bicitra ghanere ||
kalapa kalapa prati prabhu avatarahīm̐ | cāru carita nānā vidhi karahīm̐ ||

140.2

तब तब कथा मुनीसन्ह गाई । परम पुनीत प्रबन्ध बनाई ॥
बिबिध प्रसङ्ग अनूप बखाने । करहिँ न सुनि आचरज सयाने ॥

taba taba kathā munīsanha gāī | parama punīta prabandha banāī ||
bibidha prasaṅga anūpa bakhāne | karahim̐ na suni ācaraja sayāne ||

140.3

हरि-अनन्त हरि-कथा-अनन्ता । कहहिँ सुनहिँ बहु बिधि सब सन्ता ॥
रामचन्द्र के चरित सुहाये । कलप कोटि लगि जाहिँ न गाये ॥

hari-ananta hari-kathā-anantā | kahahim̐ sunahim̐ bahu bidhi saba santā ||
rāmacandra ke carita suhāye | kalapa koṭi lagi jāhim̐ na gāye ||

140.4

यह प्रसङ्ग मैँ कहा भवानी । हरि-माया मोहहिँ मुनि ज्ञानी ॥
प्रभु कौतुकी प्रनत-हितकारी । सेवत सुलभ सकल-दुख-हारी ॥

yaha prasaṅga maim̐ kahā bhavānī | hari-māyā mohahim̐ muni jñānī ||
prabhu kautukī pranata-hitakārī | sevata sulabha sakala-dukha-hārī ||

140.सो॰ 140सोरठा

सुर नर मुनि कोउ नाहिँ, जेहि न मोह माया प्रबल ।
अस बिचारि मन माहिँ, भजिय महा-माया-पतिहि ॥

sura nara muni kou nāhim̐, jehi na moha māyā prabala |
asa bicāri mana māhim̐, bhajiya mahā-māyā-patihi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0