नारद आगे कहते हैं, आप परम स्वतन्त्र हैं, सिर पर कोई नहीं, जो मन को भाता है वही करते हैं। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हैं,। सबको ठग ठगकर परच गए हैं, शुभ अशुभ कर्म आपको बाधा नहीं देते, अब तक किसी ने आपको सीधा नहीं किया। अब अच्छे घर बायना दिया है, अपना किया फल पाओगे। जिस देह को धरकर मुझे ठगा, वही देह धारण करो, यह मेरा शाप है। मेरा रूप बन्दर का बनाया, इसलिए बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने मेरा बड़ा अपकार किया, इसलिए तुम स्त्री के विरह में दुखी होगे। प्रभु ने प्रसन्न हृदय से शाप सिर पर धरा, बहुत विनती की, और तब कृपानिधि ने अपनी माया की प्रबलता खींच ली।