पुनि जल दीख रूप निज पावा । तदपि हृदयँ सन्तोष न आवा ॥
फरकत अधर कोप मन माहीँ । सपदि चले कमलापति पाहीँ ॥
puni jala dīkha rūpa nija pāvā | tadapi hṛdayam̐ santoṣa na āvā ||
pharakata adhara kopa mana māhīm̐ | sapadi cale kamalāpati pāhīm̐ ||
5 श्लोक · 136 में से 361
जल में फिर देखने पर नारद ने अपना असली रूप पाया, फिर भी हृदय को सन्तोष न हुआ। वे तुरन्त कमलापति के पास चले, यह सोचकर कि या तो शाप दूँगा या जाकर मर जाऊँगा, उन्होंने जगत में मेरी हँसी कराई। बीच मार्ग में ही दैत्यों के शत्रु मिल गए, साथ में लक्ष्मी और वही राजकुमारी थीं। प्रभु ने मधुर वाणी में पूछा कि मुनि, व्याकुल से होकर कहाँ चले? यह सुनते ही अत्यन्त क्रोध उपजा और माया के वश मन में बोध न रहा। नारद बोले, आप दूसरे की सम्पदा देख नहीं सकते, आपमें ईर्ष्या और कपट भरा है। समुद्रमन्थन में आपने रुद्र को बावला किया और उन्हें विष पिलवाया। असुरों को मदिरा, शंकर को विष, और अपने लिए लक्ष्मी और सुन्दर मणि रख ली।
पुनि जल दीख रूप निज पावा । तदपि हृदयँ सन्तोष न आवा ॥
फरकत अधर कोप मन माहीँ । सपदि चले कमलापति पाहीँ ॥
puni jala dīkha rūpa nija pāvā | tadapi hṛdayam̐ santoṣa na āvā ||
pharakata adhara kopa mana māhīm̐ | sapadi cale kamalāpati pāhīm̐ ||
देहउँ साप कि मरिहउँ जाई । जगत मोर उपहास कराई ॥
बीचहिं पन्थ मिले दनुजारी । सङ्ग रमा सोइ राजकुमारी ॥
dehaum̐ sāpa ki marihaum̐ jāī | jagata mora upahāsa karāī ||
bīcahiṃ pantha mile danujārī | saṅga ramā soi rājakumārī ||
बोले मधुर बचन सुर-साँई । मुनि कहँ चले बिकल की नाँई ॥
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा । माया-बस न रहा मन बोधा ॥
bole madhura bacana sura-sām̐ī | muni kaham̐ cale bikala kī nām̐ī ||
sunata bacana upajā ati krodhā | māyā-basa na rahā mana bodhā ||
पर सम्पदा सकहु नहिँ देखी । तुम्हरें इरिषा कपट बिसेखी ॥
मथत सिन्धु रुद्रहि बौरायहु । सुरन्ह प्रेरि विष पान करायहु ॥
para sampadā sakahu nahim̐ dekhī | tumhareṃ iriṣā kapaṭa bisekhī ||
mathata sindhu rudrahi baurāyahu | suranha preri viṣa pāna karāyahu ||
असुर सुरा बिष सङ्करहि, आपु रमा मनि चारु ।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह, सदा कपट व्यवहारु ॥
asura surā biṣa saṅkarahi, āpu ramā mani cāru |
svāratha sādhaka kuṭila tumha, sadā kapaṭa vyavahāru ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0