सब जानत प्रभु प्रभुता सोई । तदपि कहें बिनु रहा न कोई ॥
तहाँ बेद अस कारन राखा । भजन प्रभाउ भाँति बहु भाखा ॥
saba jānata prabhu prabhutā soī | tadapi kaheṃ binu rahā na koī ||
tahām̐ beda asa kārana rākhā | bhajana prabhāu bhām̐ti bahu bhākhā ||
6 श्लोक · 13 में से 361
सब जानते हैं कि प्रभु की महिमा कही नहीं जा सकती, फिर भी कोई कहे बिना नहीं रहता, क्योंकि वेद कहते हैं कि गुणगान भी भजन है। जो एक, इच्छारहित, रूपरहित, नामरहित, अजन्मा, सच्चिदानन्द और सर्वव्यापक है, वही केवल भक्तों के लिए देह धरकर अनेक लीलाएँ करता है। वह परम कृपालु है, शरणागत से प्रेम करता है और जिस पर करुणा करता है उस पर क्रोध नहीं करता। वह गई वस्तु लौटाता है और गरीबों को निहाल करता है। यह जानकर बुद्धिमान हरियश से अपनी वाणी पवित्र करते हैं। उसी बल से तुलसीदास राम के चरणों में सिर नवाकर कथा कहेंगे। मुनियों का बनाया मार्ग सुगम है। राजा नदी पर पुल बनवा दे तो चींटी भी पार हो जाती है।
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई । तदपि कहें बिनु रहा न कोई ॥
तहाँ बेद अस कारन राखा । भजन प्रभाउ भाँति बहु भाखा ॥
saba jānata prabhu prabhutā soī | tadapi kaheṃ binu rahā na koī ||
tahām̐ beda asa kārana rākhā | bhajana prabhāu bhām̐ti bahu bhākhā ||
एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानन्द पर धामा ॥
व्यापक बिस्व-रूप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ॥
eka anīha arūpa anāmā | aja saccidānanda para dhāmā ||
vyāpaka bisva-rūpa bhagavānā | tehiṃ dhari deha carita kṛta nānā ||
सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत-अनुरागी ॥
जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू ॥
so kevala bhagatana hita lāgī | parama kṛpāla pranata-anurāgī ||
jehi jana para mamatā ati chohū | jehiṃ karunā kari kīnha na kohū ||
गई बहोर गरीब-नेवाजू । सरल सबल साहिब रघुराजू ॥
बुध बरनहिँ हरि जस अस जानी । करहिं पुनीत सुफल निज-बानी ॥
gaī bahora garība-nevājū | sarala sabala sāhiba raghurājū ||
budha baranahim̐ hari jasa asa jānī | karahiṃ punīta suphala nija-bānī ||
तेहिं बल मैं रघुपति गुन-गाथा । कहिहउँ नाइ राम-पद माथा ॥
मुनिन्ह प्रथम हरि-कीरति गाई । तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई ॥
tehiṃ bala maiṃ raghupati guna-gāthā | kahihaum̐ nāi rāma-pada māthā ||
muninha prathama hari-kīrati gāī | tehiṃ maga calata sugama mohi bhāī ||
अति अपार जे सरित बर, जौँ नृप सेतु कराहिँ ।
चढ़ि पिपीलिकउ परम-लघु, बिनु स्रम पारहि जाहिँ ॥
ati apāra je sarita bara, jaum̐ nṛpa setu karāhim̐ |
car̤hi pipīlikau parama-laghu, binu srama pārahi jāhim̐ ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0