बालकाण्ड

अध्याय 113: हरिकथा बिना जीवन व्यर्थ

5 श्लोक · 113 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

हरिकथा बिना जीवन व्यर्थ

शिव बोले, फिर भी तुमने वही शंका इसलिए की कि कहने सुनने वाले सबका हित हो। जिन्होंने कानों से हरिकथा नहीं सुनी, उनके कान के छेद साँप के बिल जैसे हैं। जिन नेत्रों ने सन्तों के दर्शन नहीं किए, वे मोर के पंख पर बनी आँखों जैसे हैं। जिन्होंने हृदय में हरिभक्ति नहीं धारण की, वे प्राणी जीते जी शव के समान हैं। जो छाती हरिचरित सुनकर हर्षित नहीं होती, वह वज्र जैसी कठोर और निष्ठुर है। हे गिरिजा, श्रीराम की लीला सुनो। रामकथा कामधेनु के समान सेवा करने वालों को सब सुख देती है, और सत्संग सब देवलोकों के समान है, ऐसा जानकर कौन इसे न सुनेगा?

113.1

तदपि असङ्का कीन्हिहु सोई । कहत सुनत सब कर हित होई ॥
जिन्ह हरि कथा सुनी नहिँ काना । श्रवन-रन्ध्र अहि-भवन समाना ॥

tadapi asaṅkā kīnhihu soī | kahata sunata saba kara hita hoī ||
jinha hari kathā sunī nahim̐ kānā | śravana-randhra ahi-bhavana samānā ||

113.2

नयनन्हि सन्त दरस नहिँ देखा । लोचन मोरपंख कर लेखा ॥
ते सिर कटु-तुंबरि समतूला । जे न नमत हरि-गुरु-पद-मूला ॥

nayananhi santa darasa nahim̐ dekhā | locana morapaṃkha kara lekhā ||
te sira kaṭu-tuṃbari samatūlā | je na namata hari-guru-pada-mūlā ||

113.3

जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिँ आनी । जीवत सव समान तेइ प्रानी ॥
जो नहिँ करइ राम-गुन-गाना । जीह सो दादुर-जीह समाना ॥

jinha haribhagati hṛdayam̐ nahim̐ ānī | jīvata sava samāna tei prānī ||
jo nahim̐ karai rāma-guna-gānā | jīha so dādura-jīha samānā ||

113.4

कुलिस-कठोर निठुर सोइ छाती । सुनि हरि-चरित न जो हरषाती ॥
गिरिजा सुनहु राम कै लीला । सुर-हित दनुज-बिमोहनसीला ॥

kulisa-kaṭhora niṭhura soi chātī | suni hari-carita na jo haraṣātī ||
girijā sunahu rāma kai līlā | sura-hita danuja-bimohanasīlā ||

दो॰ 113दोहा

रामकथा सुरधेनु सम, सेवत सब सुख-दानि ।
सतसमाज सुरलोक सब, को न सुनइ अस जानि ॥

rāmakathā suradhenu sama, sevata saba sukha-dāni |
satasamāja suraloka saba, ko na sunai asa jāni ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0