मनि मानिक मुकुता छबि जैसी । अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी ॥
नृप-किरीट तरुनी-तनु पाई । लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥
mani mānika mukutā chabi jaisī | ahi giri gaja sira soha na taisī ||
nṛpa-kirīṭa tarunī-tanu pāī | lahahiṃ sakala sobhā adhikāī ||
6 श्लोक · 11 में से 361
मणि और मोती साँप, पर्वत और हाथी में उत्पन्न होते हैं, पर उनकी शोभा राजा के मुकुट या युवती के शरीर पर बढ़ती है। बुद्धिमान कहते हैं कि कविता भी कहीं जन्म लेती है और कहीं और शोभा पाती है। भक्ति से स्मरण करने पर शारदा ब्रह्मलोक छोड़कर दौड़ी आती हैं, और उनकी थकान रामचरित के सरोवर में नहाए बिना नहीं मिटती। इसलिए कवि हरियश गाते हैं, और साधारण मनुष्यों का गुणगान होने पर सरस्वती सिर धुनकर पछताती हैं। हृदय समुद्र है, बुद्धि सीपी और शारदा स्वाती का जल। श्रेष्ठ विचार बरसें तो कविता रूपी मोती बनते हैं, जिन्हें युक्ति से बेधकर रामचरित के धागे में पिरोया जाए तो सज्जन उन्हें हृदय पर धारण करते हैं।
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी । अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी ॥
नृप-किरीट तरुनी-तनु पाई । लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥
mani mānika mukutā chabi jaisī | ahi giri gaja sira soha na taisī ||
nṛpa-kirīṭa tarunī-tanu pāī | lahahiṃ sakala sobhā adhikāī ||
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं । उपजहिँ अनत अनत छबि लहहीं ॥
भगति-हेतु बिधि भवन बिहाई । सुमिरत सारद आवति धाई ॥
taisehiṃ sukabi kabita budha kahahīṃ | upajahim̐ anata anata chabi lahahīṃ ||
bhagati-hetu bidhi bhavana bihāī | sumirata sārada āvati dhāī ||
राम चरित सर बिनु अन्हवाये । सो सम जाइ न कोटि उपाये ॥
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी । गावहिं हरि जस कलि मल हारी ॥
rāma carita sara binu anhavāye | so sama jāi na koṭi upāye ||
kabi kobida asa hṛdayam̐ bicārī | gāvahiṃ hari jasa kali mala hārī ||
कीन्हें प्राकृत-जन गुन गाना । सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ॥
हृदय-सिन्धु मति-सीपि समाना । स्वाती-सारदा कहहिँ सुजाना ॥
kīnheṃ prākṛta-jana guna gānā | sira dhuni girā lagata pachitānā ||
hṛdaya-sindhu mati-sīpi samānā | svātī-sāradā kahahim̐ sujānā ||
जौं बरषइ बर-बारि बिचारू । होहिँ कबित-मुकता-मनि चारू ॥
jauṃ baraṣai bara-bāri bicārū | hohim̐ kabita-mukatā-mani cārū ||
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं, रामचरित बर ताग ।
पहिरहिँ सज्जन बिमल उर, सोभा अति अनुराग ॥
juguti bedhi puni pohiahiṃ, rāmacarita bara tāga |
pahirahim̐ sajjana bimala ura, sobhā ati anurāga ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0