बालकाण्ड

अध्याय 108: पार्वती का संशय, राजकुमार या ब्रह्म

5 श्लोक · 108 में से 361

इस अध्याय में क्या होता है

पार्वती का संशय, राजकुमार या ब्रह्म

पार्वती बोलीं, हे सुख की राशि, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे अपनी दासी मानते हैं, तो रघुनाथ की कथा अनेक प्रकार कहकर मेरा अज्ञान दूर कीजिए। जिसके घर कल्पवृक्ष हो, क्या वह दरिद्रता का दुःख सहेगा? हे चन्द्रभूषण, ऐसा विचारकर मेरी बुद्धि का भारी भ्रम हरिए। हे प्रभु, परमार्थ का उपदेश करने वाले मुनि श्रीराम को अनादि ब्रह्म कहते हैं। और हे कामारि, आप भी दिन रात आदर से राम राम जपते हैं। ये राम वही अवधनरेश के पुत्र हैं, या कोई अजन्मा, निर्गुण और अलख दूसरे हैं? यदि वे राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे, जिनकी बुद्धि स्त्री के विरह में भोली हो गई? उनके चरित देखकर और महिमा सुनकर मेरी बुद्धि बहुत भ्रमित होती है।

108.1

जौँ मो पर प्रसन्न सुखरासी । जानिय सत्य मोहि निज-दासी ॥
तौँ प्रभु हरहु मोर अग्याना । कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना ॥

jaum̐ mo para prasanna sukharāsī | jāniya satya mohi nija-dāsī ||
taum̐ prabhu harahu mora agyānā | kahi raghunātha kathā bidhi nānā ||

108.2

जासु भवन सुरतरु तर होई । सहि कि दरिद्र-जनित-दुख सोई ॥
ससि-भूषन अस हृदयँ बिचारी । हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी ॥

jāsu bhavana surataru tara hoī | sahi ki daridra-janita-dukha soī ||
sasi-bhūṣana asa hṛdayam̐ bicārī | harahu nātha mama mati bhrama bhārī ||

108.3

प्रभु जे मुनि परमारथबादी । कहहिँ राम कहँ ब्रह्म अनादी ॥
सेष सारदा बेद पुराना । सकल करहिँ रघुपति-गुन-गाना ॥

prabhu je muni paramārathabādī | kahahim̐ rāma kaham̐ brahma anādī ||
seṣa sāradā beda purānā | sakala karahim̐ raghupati-guna-gānā ||

108.4

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती । सादर जपहु अनङ्ग-आराती ॥
राम सो अवध-नृपति-सुत सोई । की अज अगुन अलख-गति कोई ॥

tumha puni rāma rāma dina rātī | sādara japahu anaṅga-ārātī ||
rāma so avadha-nṛpati-suta soī | kī aja aguna alakha-gati koī ||

दो॰ 108दोहा

जौँ नृप-तनय त ब्रह्म किमि, नारि बिरहँ मति भोरि ।
देखि चरित महिमा सुनत, भ्रमति बुद्धि अति मोरि ॥

jaum̐ nṛpa-tanaya ta brahma kimi, nāri biraham̐ mati bhori |
dekhi carita mahimā sunata, bhramati buddhi ati mori ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0