भइ दिनकर-कुल-बिटप कुठारी । कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी ॥
भयउ बिषाद निषादहि भारी । राम-सीय महि सयन निहारी ॥
bhai dinakara-kula-biṭapa kuṭhārī | kumati kīnha saba bisva dukhārī ||
bhayau biṣāda niṣādahi bhārī | rāma-sīya mahi sayana nihārī ||
5 श्लोक · 92 में से 326
गुह कहता है कि कैकेयी की कुबुद्धि सूर्यकुल रूपी वृक्ष के लिए कुल्हाड़ी बनी, और राम सीता को भूमि पर सोते देख उसे भारी विषाद हुआ। तब लक्ष्मण ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के रस में सनी मधुर वाणी बोले। हे भाई, कोई किसी को सुख दुख देने वाला नहीं, सब अपने किए कर्म का फल भोगते हैं। संयोग, वियोग, मित्र, शत्रु और उदासीन, ये सब भ्रम के फन्दे हैं। जन्म, मृत्यु, सम्पत्ति, विपत्ति, कर्म, काल, घर, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक, जो कुछ देखा, सुना और सोचा जाता है, उसकी जड़ मोह है, वह परमार्थ नहीं। जैसे सपने में राजा भिखारी हो जाए या कंगाल इन्द्र बन जाए, पर जागने पर न लाभ है न हानि, वैसे ही इस प्रपंच को देखो।
भइ दिनकर-कुल-बिटप कुठारी । कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी ॥
भयउ बिषाद निषादहि भारी । राम-सीय महि सयन निहारी ॥
bhai dinakara-kula-biṭapa kuṭhārī | kumati kīnha saba bisva dukhārī ||
bhayau biṣāda niṣādahi bhārī | rāma-sīya mahi sayana nihārī ||
बोले लखन मधुर मृदु-बानी । ज्ञान-बिराग भगति-रस सानी ॥
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता । निज कृत करम भोग सुनु भ्राता ॥
bole lakhana madhura mṛdu-bānī | jñāna-birāga bhagati-rasa sānī ||
kāhu na kou sukha dukha kara dātā | nija kṛta karama bhoga sunu bhrātā ||
जोग बियोग भोग भल मन्दा । हित अनहित मध्यम भ्रम फन्दा ॥
जनम मरन जहँ लगि जग जालू । सम्पति बिपति करम अरु कालू ॥
joga biyoga bhoga bhala mandā | hita anahita madhyama bhrama phandā ||
janama marana jaham̐ lagi jaga jālū | sampati bipati karama aru kālū ||
धरनि धाम धन पुर परिवारू । सरग नरक जहँ लगि व्यवहारू ॥
देखिय सुनिय गुनिअ मन माहीं । मोह मूल परमारथ नाहीं ॥
dharani dhāma dhana pura parivārū | saraga naraka jaham̐ lagi vyavahārū ||
dekhiya suniya gunia mana māhīṃ | moha mūla paramāratha nāhīṃ ||
सपनें होइ भिखारि नृप, रङ्क नाकपति होइ ।
जागें लाभ न हानि कछु, तिमि प्रपञ्च जियँ जोइ ॥
sapaneṃ hoi bhikhāri nṛpa, raṅka nākapati hoi |
jāgeṃ lābha na hāni kachu, timi prapañca jiyam̐ joi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0