अयोध्याकाण्ड

अध्याय 9: वसिष्ठ का आगमन, श्रीराम की विनम्रता

5 श्लोक · 9 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

वसिष्ठ का आगमन, श्रीराम की विनम्रता

राजा ने वसिष्ठ को श्रीराम के महल शिक्षा देने भेजा। गुरु का आगमन सुनकर श्रीरघुनाथ ने द्वार पर आकर चरणों में माथा नवाया। आदर से अर्घ्य देकर घर में लाए और षोडशोपचार से पूजकर सम्मान किया। फिर सीता सहित चरण पकड़कर हाथ जोड़कर बोले: सेवक के घर स्वामी का आना मंगल का मूल है, फिर भी उचित यही है कि नाथ सेवक को प्रेम से बुलाकर काम पर भेजें, यही नीति है। आपने प्रभुता छोड़कर स्नेह किया, आज यह घर पवित्र हो गया। गोसाईं, जो आज्ञा हो वही करूँ, सेवक का लाभ स्वामी की सेवा है। स्नेह में सने वचन सुनकर मुनि ने प्रशंसा की और कहा, हे सूर्यवंश के भूषण, तुम ऐसा क्यों न कहो।

9.1

तब नरनाहँ बसिष्ठ बोलाये । राम-धाम सिख देन पठाये ॥
गुर आगमनु सुनत रघुनाथा । द्वार आइ पद नायउ माथा ॥

taba naranāham̐ basiṣṭha bolāye | rāma-dhāma sikha dena paṭhāye ||
gura āgamanu sunata raghunāthā | dvāra āi pada nāyau māthā ||

9.2

सादर अरघ देइ घर आने । सोरह भाँति पूजि सनमाने ॥
गहे चरन सिय-सहित बहोरी । बोले राम कमल-कर जोरी ॥

sādara aragha dei ghara āne | soraha bhām̐ti pūji sanamāne ||
gahe carana siya-sahita bahorī | bole rāma kamala-kara jorī ||

9.3

सेवक सदन स्वामि आगमनू । मङ्गल-मूल अमङ्गल-दमनू ॥
तदपि उचित जन बोलि सप्रीती । पठइअ काज नाथ असि नीती ॥

sevaka sadana svāmi āgamanū | maṅgala-mūla amaṅgala-damanū ||
tadapi ucita jana boli saprītī | paṭhaia kāja nātha asi nītī ||

9.4

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू । भयउ पुनीत आजु यह गेहू ॥
आयसु होइ सो करउँ गोसाँई । सेवक लहइ स्वामि सेवकाई ॥

prabhutā taji prabhu kīnha sanehū | bhayau punīta āju yaha gehū ||
āyasu hoi so karaum̐ gosām̐ī | sevaka lahai svāmi sevakāī ||

दो॰ 9दोहा

सुनि सनेह साने बचन, मुनि रघुबरहि प्रसंस ।
राम कस न तुम्ह कहहु अस, हंस-बंस-अवतंस ॥

suni saneha sāne bacana, muni raghubarahi prasaṃsa |
rāma kasa na tumha kahahu asa, haṃsa-baṃsa-avataṃsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0