सीता सचिव सहित दोउ भाई । सृङ्गबेरपुर पहुँचे जाई ॥
उतरे राम देवसरि देखी । कीन्ह दंडवत हरष बिसेखी ॥
sītā saciva sahita dou bhāī | sṛṅgaberapura pahum̐ce jāī ||
utare rāma devasari dekhī | kīnha daṃḍavata haraṣa bisekhī ||
5 श्लोक · 87 में से 326
सीता और मन्त्री सहित दोनों भाई शृंगवेरपुर पहुँचे। देवनदी गंगा को देखकर श्रीराम रथ से उतरे और बड़े हर्ष से दण्डवत किया। लक्ष्मण, सुमन्त्र और सीता ने भी प्रणाम किया। गंगा सब मंगल की जड़ हैं, सब सुख देने वाली और सब पीड़ा हरने वाली। अनेक कथा प्रसंग कहते हुए राम गंगा की लहरें निहारते हैं और मन्त्री, भाई तथा प्रिया को देवनदी की महिमा सुनाते हैं। उन्होंने स्नान किया, मार्ग की थकान मिट गई, और पवित्र जल पीकर मन प्रसन्न हुआ। तुलसीदास कहते हैं कि जिनके स्मरण से ही सारी थकान मिट जाती है, उनका थकना केवल लोक व्यवहार है। शुद्ध सच्चिदानन्द, सूर्यकुल के ध्वज प्रभु मनुष्य जैसा आचरण करते हैं, और उनके ये चरित संसार सागर के सेतु हैं।
सीता सचिव सहित दोउ भाई । सृङ्गबेरपुर पहुँचे जाई ॥
उतरे राम देवसरि देखी । कीन्ह दंडवत हरष बिसेखी ॥
sītā saciva sahita dou bhāī | sṛṅgaberapura pahum̐ce jāī ||
utare rāma devasari dekhī | kīnha daṃḍavata haraṣa bisekhī ||
लखन सचिवँ सियँ किये प्रनामा । सबहिँ सहित सुख पायउ रामा ॥
गङ्ग सकल मुद-मङ्गल-मूला । सब सुख-करनि हरनि सब सूला ॥
lakhana sacivam̐ siyam̐ kiye pranāmā | sabahim̐ sahita sukha pāyau rāmā ||
gaṅga sakala muda-maṅgala-mūlā | saba sukha-karani harani saba sūlā ||
कहि कहि कोटिक कथा प्रसङ्गा । राम बिलोकहिँ गङ्ग-तरङ्गा ॥
सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई । बिबुध नदी महिमा अधिकाई ॥
kahi kahi koṭika kathā prasaṅgā | rāma bilokahim̐ gaṅga-taraṅgā ||
sacivahi anujahi priyahi sunāī | bibudha nadī mahimā adhikāī ||
मज्जन कीन्ह पन्थ स्त्रम गयऊ । सुचि जल पिअत मुदित मन भयऊ ॥
सुमिरत जाहि मिटइ श्रम-भारू । तेहि श्रम यह लौकिक व्यवहारू ॥
majjana kīnha pantha strama gayaū | suci jala piata mudita mana bhayaū ||
sumirata jāhi miṭai śrama-bhārū | tehi śrama yaha laukika vyavahārū ||
सुद्ध सच्चिदानन्द-मय, कन्द भानुकुल-केतु ।
चरित करत नर अनुहरत, संसृति-सागर-सेतु ॥
suddha saccidānanda-maya, kanda bhānukula-ketu |
carita karata nara anuharata, saṃsṛti-sāgara-setu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0