अयोध्याकाण्ड

अध्याय 84: प्रजा का श्रीराम के साथ चलने का निश्चय

5 श्लोक · 84 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

प्रजा का श्रीराम के साथ चलने का निश्चय

राम वियोग से व्याकुल लोग ऐसे खड़े रह गए मानो चित्र में लिखे हों, सारा नगर शोक का घना वन बन गया। तुलसीदास कहते हैं कि विधाता ने कैकेयी को भीलनी बना दिया, जिसने दसों दिशाओं में असहनीय दावानल लगा दिया। विरह की वह आग न सह सकने के कारण सब लोग पीछे दौड़े। सबने मन में ठाना कि राम, लक्ष्मण और सीता के बिना सुख नहीं, जहाँ राम हैं वहीं सारा समाज है, उनके बिना अवध किसी काम का नहीं। यह निश्चय कर वे देवताओं को भी दुर्लभ सुख के घर छोड़कर चल पड़े, क्योंकि जिन्हें राम के चरणकमल प्रिय हैं उन्हें विषय भोग नहीं बाँधते। बालकों और बूढ़ों को छोड़ सब साथ हो लिए, और पहले दिन रघुनाथ ने तमसा के तट पर निवास किया।

84.1

राम-बियोग बिकल दुख ठाढ़े । जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े ॥
नगरु सफल बनु गहबर भारी । खग मृग बिपुल सकल नर नारी ॥

rāma-biyoga bikala dukha ṭhār̤he | jaham̐ taham̐ manahum̐ citra likhi kār̤he ||
nagaru saphala banu gahabara bhārī | khaga mṛga bipula sakala nara nārī ||

84.2

बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही । जेहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही ॥
सहि न सके रघुबर बिरहागी । चले लोग सब ब्याकुल भागी ॥

bidhi kaikeī kirātini kīnhī | jehi dava dusaha dasahum̐ disi dīnhī ||
sahi na sake raghubara birahāgī | cale loga saba byākula bhāgī ||

84.3

सबहिं विचार कीन्ह मन माहीँ । राम-लखन-सिय बिनु सुख नाहीँ ॥
जहाँ राम तहँ सबइ समाजू । बिनु रघुबीर अवध नहिँ काजू ॥

sabahiṃ vicāra kīnha mana māhīm̐ | rāma-lakhana-siya binu sukha nāhīm̐ ||
jahām̐ rāma taham̐ sabai samājū | binu raghubīra avadha nahim̐ kājū ||

84.4

चले साथ अस मन्त्र दृढ़ाई । सुर-दुर्लभ सुख-सदन बिहाई ॥
राम-चरन-पङ्कज प्रिय जिन्हहीं । बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हहीं ॥

cale sātha asa mantra dṛr̤hāī | sura-durlabha sukha-sadana bihāī ||
rāma-carana-paṅkaja priya jinhahīṃ | biṣaya bhoga basa karahiṃ ki tinhahīṃ ||

दो॰ 84दोहा

बालक बृद्ध बिहाइ गृह, लगे लोग सब साथ ।
तमसा तीर निवास किय, प्रथम दिवस रघुनाथ ॥

bālaka bṛddha bihāi gṛha, lage loga saba sātha |
tamasā tīra nivāsa kiya, prathama divasa raghunātha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0