अयोध्याकाण्ड

अध्याय 77: श्रीराम पिता से आशीर्वाद माँगते हैं

5 श्लोक · 77 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम पिता से आशीर्वाद माँगते हैं

व्याकुल राजा बोल नहीं सकते, शोक से हृदय में दारुण जलन है। अत्यन्त प्रेम से चरणों में सिर नवाकर रघुवीर ने उठकर विदा माँगी, पिताजी, आशीर्वाद और आज्ञा दीजिए, हर्ष के समय विषाद क्यों करते हैं? प्रेम में कर्तव्य चूकने से अपयश होता है। यह सुनकर स्नेह के वश राजा ने उठकर रघुपति की बाँह पकड़कर बैठा लिया। बोले, बेटा, सुनो, मुनि तुम्हें चराचर का स्वामी कहते हैं। ईश्वर हृदय में विचारकर शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार फल देते हैं; जो कर्म करता है वही फल पाता है, वेद की नीति ऐसी है और सब यही कहते हैं। पर यहाँ अपराध कोई और करता है और फल कोई और भोगता है। भगवान की गति अत्यन्त विचित्र है, जगत में उसे जानने योग्य कौन है?

77.1

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू । सोक-जनित उर दारुन दाहू ॥
नाइ सीस पद अति अनुरागा । उठि रघुबीर बिदा तब माँगा ॥

sakai na boli bikala naranāhū | soka-janita ura dāruna dāhū ||
nāi sīsa pada ati anurāgā | uṭhi raghubīra bidā taba mām̐gā ||

77.2

पितु असीस आयसु मोहि दीजै । हरष समय बिसमउ कत कीजै ॥
तात किये प्रिय प्रेम प्रमादू । जस जग जाइ होइ अपवादू ॥

pitu asīsa āyasu mohi dījai | haraṣa samaya bisamau kata kījai ||
tāta kiye priya prema pramādū | jasa jaga jāi hoi apavādū ||

77.3

सुनि सनेह-बस उठि नरनाहाँ । बैठारे रघुपति गहि बाहाँ ॥
सुनहु तात तुम्ह कहँ मुनि कहहीं । राम चराचर-नायक अहहीं ॥

suni saneha-basa uṭhi naranāhām̐ | baiṭhāre raghupati gahi bāhām̐ ||
sunahu tāta tumha kaham̐ muni kahahīṃ | rāma carācara-nāyaka ahahīṃ ||

77.4

सुभ अरु असुभ करम अनुहारी । ईस देइ फल हृदय बिचारी ॥
करइ जो करम पान फल सोई । निगम नीति असि कह सब कोई ॥

subha aru asubha karama anuhārī | īsa dei phala hṛdaya bicārī ||
karai jo karama pāna phala soī | nigama nīti asi kaha saba koī ||

दो॰ 77दोहा

और करइ अपराध कोउ, और पाव फल-भोगु ।
अति विचित्र भगवन्त गति, को जग जानइ जोग ॥

aura karai aparādha kou, aura pāva phala-bhogu |
ati vicitra bhagavanta gati, ko jaga jānai joga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0