दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं । लागि अगम अपनी कदराईं ॥
नर बर धीर धरम-धुर-धारी । निगम नीति कहँ ते अधिकारी ॥
dīnhi mohi sikha nīki gosāīṃ | lāgi agama apanī kadarāīṃ ||
nara bara dhīra dharama-dhura-dhārī | nigama nīti kaham̐ te adhikārī ||
5 श्लोक · 72 में से 326
लक्ष्मण बोले, स्वामी ने मुझे अच्छी सीख दी, पर अपनी कायरता से वह मुझे अगम लगी। वेद और नीति के अधिकारी धीर, धर्मधुरन्धर पुरुष हैं। मैं प्रभु के स्नेह में पला बालक हूँ; क्या हंस मन्दराचल या सुमेरु उठा सकता है? मैं गुरु, पिता, माता किसी को नहीं जानता, नाथ, स्वभाव से कहता हूँ, विश्वास कीजिए। जगत में जहाँ तक स्नेह, नाते है, हे दीनबन्धु, अन्तर्यामी स्वामी, मेरे लिए सब आप ही हैं। धर्म और नीति का उपदेश उसे दीजिए जिसे कीर्ति, ऐश्वर्य और सद्गति प्रिय हो; जो मन, कर्म, वचन से चरणों में रत हो, क्या कृपासिन्धु उसे त्याग देंगे? भाई के कोमल, विनीत वचन सुनकर और उन्हें स्नेह से डरा जानकर प्रभु ने हृदय से लगाकर समझाया।
दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं । लागि अगम अपनी कदराईं ॥
नर बर धीर धरम-धुर-धारी । निगम नीति कहँ ते अधिकारी ॥
dīnhi mohi sikha nīki gosāīṃ | lāgi agama apanī kadarāīṃ ||
nara bara dhīra dharama-dhura-dhārī | nigama nīti kaham̐ te adhikārī ||
मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला । मन्दर मेरु कि लेहिँ मराला ॥
गुरु पितु मातु न जानउँ काहू । कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू ॥
maiṃ sisu prabhu saneham̐ pratipālā | mandara meru ki lehim̐ marālā ||
guru pitu mātu na jānaum̐ kāhū | kahaum̐ subhāu nātha patiāhū ||
जहँ लगि जगत सनेह सगाई । प्रीति प्रतीति निगम निपुनाई ॥
मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी । दीनबन्धु उर अन्तरजामी ॥
jaham̐ lagi jagata saneha sagāī | prīti pratīti nigama nipunāī ||
moreṃ sabai eka tumha svāmī | dīnabandhu ura antarajāmī ||
धरम नीति उपदेसिअ ताही । कीरति-भूति-सुगति प्रिय जाही ॥
मन क्रम बचन चरन-रत होई । कृपासिन्धु परिहरिअ कि सोई ॥
dharama nīti upadesia tāhī | kīrati-bhūti-sugati priya jāhī ||
mana krama bacana carana-rata hoī | kṛpāsindhu pariharia ki soī ||
करुनासिन्धु सुबन्धु के, सुनि मृदु बचन बिनीत ।
समुझाये उर लाइ प्रभु, जानि सनेहँ सभीत ॥
karunāsindhu subandhu ke, suni mṛdu bacana binīta |
samujhāye ura lāi prabhu, jāni saneham̐ sabhīta ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0