जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा । सो तेहिं काज प्रथम जनु कीन्हा ॥
बिप्र साधु सुर पूजत राजा । करत राम हित मङ्गल-काजा ॥
jo munīsa jehi āyasu dīnhā | so tehiṃ kāja prathama janu kīnhā ||
bipra sādhu sura pūjata rājā | karata rāma hita maṅgala-kājā ||
5 श्लोक · 7 में से 326
मुनीश ने जिसे जो आज्ञा दी, उसने वह काम मानो पहले ही कर रखा था। राजा ब्राह्मणों, साधुओं और देवताओं को पूजते हुए श्रीराम के हित में मंगल कार्य कर रहे हैं। अभिषेक का समाचार सुनते ही अवध में बधाई के बाजे ज़ोर से बजने लगे। श्रीराम और सीता के मंगल अंग फड़कने लगे। प्रेम से पुलकित होकर वे आपस में कहते हैं कि ये शकुन भरत के आने की सूचना हैं। बहुत दिन बीत गए, बड़ी प्रतीक्षा है, शकुन प्रिय से मिलने का भरोसा दे रहे हैं। भरत जैसा प्रिय संसार में कौन है, शकुन का यही फल है। श्रीराम को भाई की चिन्ता दिन-रात ऐसे रहती है जैसे कछुए का मन अपने अण्डों में। यह मंगल सुनकर रनिवास ऐसे उमगा जैसे बढ़ते चन्द्रमा को देख समुद्र की लहरें।
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा । सो तेहिं काज प्रथम जनु कीन्हा ॥
बिप्र साधु सुर पूजत राजा । करत राम हित मङ्गल-काजा ॥
jo munīsa jehi āyasu dīnhā | so tehiṃ kāja prathama janu kīnhā ||
bipra sādhu sura pūjata rājā | karata rāma hita maṅgala-kājā ||
सुनत राम अभिषेक सुहावा । बाज गहागह अवध बधावा ॥
राम-सीय-तन सगुन जनाये । फरकहिँ मङ्गल अङ्ग सुहाये ॥
sunata rāma abhiṣeka suhāvā | bāja gahāgaha avadha badhāvā ||
rāma-sīya-tana saguna janāye | pharakahim̐ maṅgala aṅga suhāye ||
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीँ । भरत आगमन सूचक अहहीँ ॥
भये बहुत दिन अति अवसेरी । सगुन प्रतीति भेँट प्रिय केरी ॥
pulaki saprema parasapara kahahīm̐ | bharata āgamana sūcaka ahahīm̐ ||
bhaye bahuta dina ati avaserī | saguna pratīti bhem̐ṭa priya kerī ||
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं । इहइ सगुन-फल दूसर नाहीँ ॥
रामहिँ बन्धु सोच दिन राती । अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती ॥
bharata sarisa priya ko jaga māhīṃ | ihai saguna-phala dūsara nāhīm̐ ||
rāmahim̐ bandhu soca dina rātī | aṃḍanhi kamaṭha hradau jehi bhām̐tī ||
एहि अवसर मङ्गल परम, सुनि रहँसेउ रनिवास ।
सोभत लखि बिधु बढ़त जनु, बारिधि बीचि बिलास ॥
ehi avasara maṅgala parama, suni raham̐seu ranivāsa |
sobhata lakhi bidhu bar̤hata janu, bāridhi bīci bilāsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0