अयोध्याकाण्ड

अध्याय 61: श्रीराम सीता को घर रहने को कहते हैं

5 श्लोक · 61 में से 326

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम सीता को घर रहने को कहते हैं

माता के सामने सीता से कहते हुए श्रीराम सकुचाते हैं, पर समय समझकर बोले, राजकुमारी, मेरी सीख सुनो। यदि अपना और मेरा भला चाहती हो तो मेरी बात मानकर घर रहो। सास की सेवा ही मेरी आज्ञा है, हे भामिनि, घर रहने में सब प्रकार भलाई है। आदर से सास ससुर के चरणों की पूजा से बढ़कर दूसरा धर्म नहीं। जब जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेम से व्याकुल होंगी, तब तब हे सुन्दरी, तुम पुरानी कथाएँ कहकर कोमल वाणी से उन्हें समझाना। सौ बार शपथ लेकर कहता हूँ, माता के हित के लिए ही तुम्हें यहाँ रखता हूँ। गुरु और वेद के सम्मत धर्म का फल बिना क्लेश मिलता है, जबकि हठ के वश गालव मुनि और राजा नहुष ने सब संकट सहे।

61.1

मातु समीप कहत सकुचाहीँ । बोले समउ समुझि मन माहीं ॥
राजकुमारि सिखावन सुनहू । आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू ॥

mātu samīpa kahata sakucāhīm̐ | bole samau samujhi mana māhīṃ ||
rājakumāri sikhāvana sunahū | āna bhām̐ti jiyam̐ jani kachu gunahū ||

61.2

आपन मोर नीक जौं चहहू । बचन हमार मानि गृह रह हूँ ॥
आयसु मोर सासु सेवकाई । सब बिधि भामिनि भवन भलाई ॥

āpana mora nīka jauṃ cahahū | bacana hamāra māni gṛha raha hūm̐ ||
āyasu mora sāsu sevakāī | saba bidhi bhāmini bhavana bhalāī ||

61.3

एहि ते अधिक धरम नहिं दूजा । सादर सासु-ससुर-पद-पूजा ॥
जब जब मातु करिहि सुधि मोरी । होइहि प्रेम-विकल मति भोरी ॥

ehi te adhika dharama nahiṃ dūjā | sādara sāsu-sasura-pada-pūjā ||
jaba jaba mātu karihi sudhi morī | hoihi prema-vikala mati bhorī ||

61.4

तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी । सुन्दरि समुझाएहु मृदु-बानी ॥
कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही । सुमुखि मातु-हित राखउँ तोही ॥

taba taba tumha kahi kathā purānī | sundari samujhāehu mṛdu-bānī ||
kahaum̐ subhāyam̐ sapatha sata mohī | sumukhi mātu-hita rākhaum̐ tohī ||

दो॰ 61दोहा

गुरु-श्रुति सम्मत धरम-फल, पाइअ बिनहिँ कलेस ।
हठ-बस सब सङ्कट सहे, गालव नहुष-नरेस ॥

guru-śruti sammata dharama-phala, pāia binahim̐ kalesa |
haṭha-basa saba saṅkaṭa sahe, gālava nahuṣa-naresa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0